आँवला नवमी: आँवले के पेड़ की पूजा, और इस दिन का दान अक्षय माना जाता है।
अक्षय नवमी की तिथि: कार्तिक शुक्ल नवमी, यानी कार्तिक के शुक्ल पक्ष की नवमी। इसलिए इसकी तारीख़ वह दिन है जिस दिन सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो। तिथि आधी रात नहीं, किसी भी मिनट पर शुरू और ख़त्म होती है, इसीलिए यही समय दिन तय करता है, और इसीलिए कोई त्योहार दूसरे देश में अलग तारीख़ को पड़ सकता है।
नई दिल्ली के लिए, भारतीय समय में।
अक्षय नवमी कार्तिक शुक्ल नवमी को, गोपाष्टमी के अगले दिन पड़ती है और इसे आंवला नवमी भी कहते हैं। अक्षय का अर्थ है जिसका क्षय न हो, और परंपरा है कि इस दिन की गई पूजा, दान और अच्छे काम का पुण्य कभी कम नहीं होता। यह भी माना जाता है कि सतयुग का आरंभ इसी नवमी को हुआ था, इसीलिए इसे कार्तिक के सबसे शुभ दिनों में गिना जाता है।
इस दिन की पूजा का केंद्र आंवले का पेड़ है। महिलाएँ उसकी पूजा करती हैं, परिक्रमा करते हुए तने पर कच्चा सूत लपेटती हैं, और परिवार उसी पेड़ के नीचे बैठकर भोजन बनाता या साथ खाता है। माना जाता है कि आंवला विष्णु और शिव दोनों को प्रिय है, और यह दिन परिवार और संतान की कुशलता के लिए रखा जाता है।
सुबह स्नान करके पूजा का संकल्प लें; घर में व्रत का चलन हो तो व्रत का भी।
आंवले के पेड़ की जड़ के पास पूर्व की ओर मुँह करके बैठें, जड़ में जल या दूध चढ़ाएँ और जगह साफ़ कर लें।
रोली, अक्षत, हल्दी, फूल और धूप चढ़ाएँ, दीया जलाएँ और आंवले का फल अर्पित करें।
पेड़ की परिक्रमा करते हुए तने पर कच्चा सूत लपेटें; घर के चलन के अनुसार सात या एक सौ आठ परिक्रमा की जाती है।
सब साथ बैठकर आंवला नवमी की कथा सुनें।
भोजन पेड़ के पास बनाएँ या ले जाएँ, पहले भोग लगाएँ, फिर वहीं परिवार के साथ खाएँ, थोड़ा आंवला भी।
किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को अन्न, कपड़े या आंवले का दान करें।
स्रोत: लोक परंपरा, उत्तर भारत में आंवला नवमी की पूजा में सुनाई जाने वाली कथा
एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण कर रही थीं और उनके मन में विष्णु और शिव की एक साथ पूजा करने की इच्छा हुई। उन्होंने सोचा कि दोनों को क्या प्रिय है: विष्णु को तुलसी प्रिय है और शिव को बेल। फिर उन्हें ध्यान आया कि आंवले के पेड़ में दोनों के गुण हैं, और उन्होंने उसी को दोनों का रूप मानकर पूजा करने का निश्चय किया।
उन्होंने श्रद्धा से आंवले के पेड़ की पूजा की। प्रसन्न होकर विष्णु और शिव उनके सामने प्रकट हुए। लक्ष्मी जी ने उसी पेड़ के नीचे भोजन बनाया, पहले दोनों को परोसा और उसके बाद स्वयं भोजन किया।
वह दिन कार्तिक शुक्ल नवमी का था। परंपरा है कि तभी से इस नवमी पर आंवले की पूजा होती है और परिवार लक्ष्मी जी की तरह उसकी छाया में बैठकर भोजन करते हैं। इसीलिए इस दिन आंवला चढ़ाया और खाया जाता है, और पेड़ के नीचे का भोजन, जो पहले भोग लगाकर फिर खाया जाता है, इस पूजा का मुख्य अंग है।
क्या करें
क्या न करें
उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश में यह दिन आंवला नवमी के नाम से ज़्यादा जाना जाता है; अक्षय नवमी नाम ओडिशा और बंगाल समेत कई जगह चलता है। मथुरा और वृंदावन में परंपरा है कि इस दिन श्रद्धालु दोनों नगरों की परिक्रमा करते हैं। बंगाल में इसी नवमी को जगद्धात्री पूजा का मुख्य दिन होता है, जो अलग पर्व है, बस तिथि एक है।
शुक्ल पक्ष में होने के कारण पूर्णिमांत और अमांत, दोनों पंचांगों में यह कार्तिक शुक्ल नवमी ही है। तारीख़ वह दिन होता है जिस दिन सूर्योदय पर और सुबह पूजा के समय नवमी हो। हर जगह का सूर्योदय अलग है, इसलिए भोर के आसपास शुरू होने वाली नवमी से अलग-अलग शहरों में यह दिन एक दिन आगे-पीछे हो सकता है।
2026 में अक्षय नवमी नई दिल्ली में बुधवार, 18 नवंबर 2026 को है। अपनी तारीख़ और समय के लिए ऊपर अपना शहर चुनें।
भारतीय समय में नवमी 18 नवंबर, सुबह 6:05 को शुरू होकर 19 नवंबर, सुबह 7:06 को ख़त्म होगी। अक्षय नवमी का दिन वह है जिस दिन सूर्योदय पर नवमी हो। इसीलिए यह 18 नवंबर को है।
नई दिल्ली में रविवार, 7 नवंबर 2027।
नई दिल्ली में गुरुवार, 26 अक्टूबर 2028।
अक्षय नवमी का दिन वह है जिस दिन सूर्योदय पर उसकी तिथि, नवमी, चल रही हो। तिथि पूरी दुनिया में एक ही क्षण शुरू और ख़त्म होती है, पर सूर्योदय हर जगह अपने समय पर होता है, इसलिए अमेरिका या ब्रिटेन में वह दिन भारत से एक दिन पहले पड़ सकता है। ऊपर के बॉक्स में अपना शहर चुनें, इस पेज की हर तारीख़ और समय उसके लिए निकाला जाएगा।
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