तुलसी जी का शालिग्राम से विवाह, और शादियों के मौसम की शुरुआत।
तुलसी विवाह की तिथि: कार्तिक शुक्ल द्वादशी, यानी कार्तिक के शुक्ल पक्ष की द्वादशी। इसलिए इसकी तारीख़ वह दिन है जिस दिन सूर्योदय पर यह तिथि चल रही हो। तिथि आधी रात नहीं, किसी भी मिनट पर शुरू और ख़त्म होती है, इसीलिए यही समय दिन तय करता है, और इसीलिए कोई त्योहार दूसरे देश में अलग तारीख़ को पड़ सकता है।
नई दिल्ली के लिए, भारतीय समय में।
तुलसी विवाह में तुलसी के पौधे का विवाह शालिग्राम से, जो विष्णु का पवित्र शिला रूप है, या कुछ घरों में श्रीकृष्ण की प्रतिमा से कराया जाता है। आंगन की तुलसी को घर की बेटी माना जाता है, और परिवार असली शादी की हर रस्म के साथ उसका ब्याह करता है: हल्दी, लाल चुनरी, सिंदूर, फेरे और कन्यादान। घर में शादी जैसे उल्लास और श्रद्धा से यह पर्व मनाया जाता है।
यह चातुर्मास के अंत में आता है। उत्तर में इससे एक दिन पहले देवउठनी एकादशी होती है, जब माना जाता है कि विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं, और उसके बाद तुलसी विवाह होता है। इसी के साथ शादियों का मौसम फिर शुरू होता है, और परिवार इसके बाद के मुहूर्तों में शादी की तारीख़ें तय करने लगते हैं।
तुलसी का गमला और आसपास की जगह साफ़ करें, रंगोली बनाएँ और गन्ने से उसके ऊपर छोटा-सा मंडप सजाएँ।
तुलसी को हल्दी लगाएँ, लाल चुनरी ओढ़ाएँ, और सिंदूर, चूड़ियाँ, बिंदी व श्रृंगार का बाकी सामान चढ़ाएँ।
शालिग्राम (या कृष्ण की प्रतिमा) को पंचामृत और गंगाजल से स्नान कराएँ, वस्त्र पहनाएँ, तिलक लगाएँ और तुलसी के पास विराजमान करें।
कलश स्थापित कर दीया जलाएँ, रोली, अक्षत, फूल और धूप से दोनों की पूजा करें, और मौसमी फल-सब्ज़ियाँ व मिठाई का भोग लगाएँ।
जो परिवार तुलसी के माता-पिता बनता है, वह कन्यादान करता है, और घर का कोई सदस्य शालिग्राम को हाथ में लेकर तुलसी के फेरे लगाता है, आम तौर पर सात, जबकि बाकी लोग विवाह गीत गाते हैं।
आरती करें, आशीर्वाद के रूप में जोड़े पर अक्षत डालें और प्रसाद बाँटें।
स्रोत: लोक परंपरा, जलंधर और वृंदा की पौराणिक कथा पर आधारित
जलंधर एक शक्तिशाली असुर था, और उसकी पत्नी वृंदा विष्णु की परम भक्त और पतिव्रता थी। कहा जाता है कि उसके पतिव्रत के बल से जलंधर अजेय था, और जब तक वह बल बना रहा, देवता भी उसे हरा नहीं सके। जब उसने शिव से युद्ध छेड़ा, तो देवता विष्णु की शरण में गए।
विष्णु जलंधर का रूप धरकर वृंदा के पास पहुँचे। उसका व्रत भंग हुआ और जलंधर शिव के हाथों युद्ध में मारा गया। सच जानकर दुखी वृंदा ने विष्णु को पत्थर हो जाने का श्राप दिया। विष्णु ने श्राप स्वीकार किया और इसी से शालिग्राम के रूप में पूजे जाने लगे। वृंदा ने देह त्याग दी, और प्रचलित कथा के अनुसार जहाँ वह थी वहाँ तुलसी का पौधा उगा।
विष्णु ने उसकी भक्ति का मान रखा: उन्होंने कहा कि शालिग्राम रूप में तुलसी से उनका विवाह होगा, और तुलसी दल के बिना उनकी कोई पूजा पूरी नहीं मानी जाएगी। हर कार्तिक में परिवार इसी विवाह का उत्सव मनाते हैं।
क्या करें
क्या न करें
तुलसी विवाह पूरे उत्तर भारत में, और महाराष्ट्र व गुजरात में ख़ास धूमधाम से मनाया जाता है, जहाँ इसे तुलशी विवाह या तुलसी लग्न भी कहते हैं। दिन घर के चलन पर निर्भर करता है: उत्तर के ज़्यादातर हिस्सों में कार्तिक शुक्ल द्वादशी; कुछ घर देवउठनी एकादशी की शाम को ही विवाह करते हैं; और कुछ द्वादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक किसी भी शाम विवाह रखते हैं।
शुक्ल पक्ष में होने के कारण पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांगों में महीना कार्तिक ही है। तिथि हर जगह के अपने सूर्योदय और सूर्यास्त से देखी जाती है, इसलिए एकादशी और द्वादशी अलग-अलग शहरों में एक दिन आगे-पीछे पड़ सकती हैं, और उसी हिसाब से विवाह का दिन भी।
2026 में तुलसी विवाह नई दिल्ली में शनिवार, 21 नवंबर 2026 को है। अपनी तारीख़ और समय के लिए ऊपर अपना शहर चुनें।
भारतीय समय में द्वादशी 21 नवंबर, सुबह 6:32 को शुरू होकर 22 नवंबर, सुबह 4:57 को ख़त्म होगी। तुलसी विवाह का दिन वह है जिस दिन सूर्योदय पर द्वादशी हो। इसीलिए यह 21 नवंबर को है।
नई दिल्ली में गुरुवार, 11 नवंबर 2027।
नई दिल्ली में रविवार, 29 अक्टूबर 2028।
तुलसी विवाह का दिन वह है जिस दिन सूर्योदय पर उसकी तिथि, द्वादशी, चल रही हो। तिथि पूरी दुनिया में एक ही क्षण शुरू और ख़त्म होती है, पर सूर्योदय हर जगह अपने समय पर होता है, इसलिए अमेरिका या ब्रिटेन में वह दिन भारत से एक दिन पहले पड़ सकता है। ऊपर के बॉक्स में अपना शहर चुनें, इस पेज की हर तारीख़ और समय उसके लिए निकाला जाएगा।
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