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नई दिल्ली · 2026, 2027, 2028

दत्तात्रेय जयंती 2026
23 दिसंबर 2026

मार्गशीर्ष पूर्णिमा की शाम भगवान दत्तात्रेय का जन्मोत्सव।

बुधवारअगहन शुक्ल पूर्णिमासूर्यास्त के बाद (प्रदोष)
दत्तात्रेय जयंती 2026 · नई दिल्लीबुधवार, 23 दिसंबरअगहन शुक्ल पूर्णिमा
पूर्णिमा शुरू
23 दिसंबर, सुबह 10:47
पूर्णिमा समाप्त
24 दिसंबर, सुबह 6:58
कैसे तय होता है
सूर्यास्त के बाद (प्रदोष)
दत्तात्रेय जयंती 2027 · नई दिल्लीसोमवार, 13 दिसंबरअगहन शुक्ल पूर्णिमा
पूर्णिमा शुरू
12 दिसंबर, रात 11:55
पूर्णिमा समाप्त
13 दिसंबर, रात 9:38
कैसे तय होता है
सूर्यास्त के बाद (प्रदोष)
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2026, 2027, 2028 में दत्तात्रेय जयंती

तिथि के समय के साथ
202623 दिसंबरबुधवार23 दिसंबर, सुबह 10:47 – 24 दिसंबर, सुबह 6:58
202713 दिसंबरसोमवार12 दिसंबर, रात 11:55 – 13 दिसंबर, रात 9:38
20281 दिसंबरशुक्रवार1 दिसंबर, सुबह 6:41 – 2 दिसंबर, सुबह 7:10

दत्तात्रेय जयंती की तिथि: अगहन शुक्ल पूर्णिमा, यानी अगहन के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा। इसलिए इसकी तारीख़ वह दिन है जिस दिन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में यह तिथि चल रही हो। तिथि आधी रात नहीं, किसी भी मिनट पर शुरू और ख़त्म होती है, इसीलिए यही समय दिन तय करता है, और इसीलिए कोई त्योहार दूसरे देश में अलग तारीख़ को पड़ सकता है।

नई दिल्ली के लिए, भारतीय समय में।

दत्तात्रेय जयंती की पूजा की तैयारी?हमारे मुहूर्त ज्योतिषी एस्ट्रो मुहूर्त से अपने परिवार और शहर के लिए सही मुहूर्त पूछें।

दत्तात्रेय जयंती क्यों मनाते हैं

इसका महत्व

दत्तात्रेय जयंती, या दत्त जयंती, मार्गशीर्ष पूर्णिमा को भगवान दत्तात्रेय के जन्म के रूप में मनाई जाती है, जो ऋषि अत्रि और माता अनसूया के पुत्र हैं। मार्कंडेय पुराण और भागवत पुराण, दोनों में उनका वर्णन है, और उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और शिव, तीनों का एक रूप मानकर पूजा जाता है। उनका जन्मोत्सव प्रदोष यानी शाम के समय, जब पूर्णिमा हो, दत्त मंदिरों में पालने और भजनों के साथ मनाया जाता है।

दत्तात्रेय को सबसे बढ़कर गुरु के रूप में पूजा जाता है: महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की दत्त परंपरा उन्हें गुरुओं का गुरु मानती है। उन्हें तीन मुख और छह भुजाओं के साथ औदुंबर (गूलर) के पेड़ के नीचे दिखाया जाता है, पीछे गाय और चरणों में चार कुत्ते, जिन्हें परंपरा पृथ्वी और चार वेद मानती है। बहुत से भक्त इस दिन तक गुरुचरित्र का पारायण पूरा करते हैं।

पूजा विधि

क्रम से
  1. 1
    पूजा की तैयारी

    स्नान करके पूजा स्थान साफ़ करें, और साफ़ कपड़े पर दत्तात्रेय की प्रतिमा या चित्र रखें, और अगर आपके पास हों तो पादुकाएँ भी।

  2. 2
    पूजन

    गंध (चंदन), हल्दी-कुमकुम, अक्षत और फूल चढ़ाएँ, और घी का दीया व धूप जलाएँ।

  3. 3
    पाठ और जप

    गुरुचरित्र का पाठ करें, या “दिगंबरा दिगंबरा श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा” अथवा “श्री गुरुदेव दत्त” का जप करें।

  4. 4
    प्रदोष में जन्मोत्सव

    शाम को, जब पूर्णिमा हो, मंदिरों की तरह जन्मोत्सव मनाएँ: छोटे पालने में उनकी प्रतिमा रखकर झुलाएँ, फूल बरसाएँ और पालना गीत गाएँ।

  5. 5
    आरती और प्रसाद

    आरती करें और प्रसाद बाँटें; महाराष्ट्र के बहुत से घरों में जन्मोत्सव के बाद सुंठवडा, यानी सोंठ और शक्कर का प्रसाद दिया जाता है।

  6. 6
    गाय या कुत्ते को भोजन

    हो सके तो गाय या कुत्ते को भोजन दें; दत्तात्रेय के चित्र में दोनों उनके साथ दिखाए जाते हैं।

पूजा सामग्री

एक दिन पहले तैयार रखें
  • दत्तात्रेय की प्रतिमा या चित्र, और पादुकाएँ अगर हों
  • साफ़ भगवा या पीला कपड़ा
  • गंध (चंदन), हल्दी-कुमकुम और अक्षत
  • फूल और माला
  • घी का दीया, धूप और कपूर
  • जन्मोत्सव के लिए छोटा पालना
  • सुंठवडा के लिए सोंठ और शक्कर
  • भोग के लिए फल और मिठाई
  • गुरुचरित्र या दत्त स्तोत्र की पुस्तक
  • गाय या कुत्ते के लिए रोटी या भोजन

दत्तात्रेय जयंती की कथा

स्रोत: मार्कंडेय पुराण और भागवत पुराण अत्रि और अनसूया के घर उनके जन्म का वर्णन करते हैं; तीनों देवों के अतिथि बनकर आने की कथा लोक परंपरा है

भागवत पुराण बताता है कि ऋषि अत्रि ने जगत के स्वामी जैसा पुत्र पाने के लिए लंबी तपस्या की। ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों एक साथ उनके सामने प्रकट हुए, और उनके आशीर्वाद से अत्रि और अनसूया के घर तीनों के अंश से पुत्र जन्मे: ब्रह्मा के अंश से सोम, विष्णु के अंश से दत्त और शिव के अंश से दुर्वासा।

लोक परंपरा यह कथा दूसरी तरह सुनाती है। अनसूया अपने पतिव्रत के लिए इतनी प्रसिद्ध थीं कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव उनकी परीक्षा लेने भिक्षुक बनकर उनके आश्रम आए, और ऐसी शर्त पर भिक्षा माँगी जिसे पूरा करना असंभव लगता था। अपने पतिव्रत के बल से अनसूया ने तीनों को शिशु बना दिया, उन्हें भोजन कराया और पालने में झुलाया।

जब सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती अपने पतियों को खोजती हुई आईं, तो अनसूया ने तीनों को उनका असली रूप लौटा दिया। प्रसन्न होकर देवों ने उन्हें वर माँगने को कहा, और अनसूया ने माँगा कि वे तीनों उनके पुत्र बनकर जन्म लें। इस तरह तीनों के एक रूप, दत्तात्रेय का जन्म हुआ।

भागवत पुराण के ग्यारहवें स्कंध में एक अवधूत की कथा भी है, जिन्होंने राजा यदु को बताया कि उन्होंने चौबीस गुरुओं से सीखा, जिनमें पृथ्वी, मधुमक्खी और मकड़ी भी थे। परंपरा इस अवधूत को दत्तात्रेय मानती है।

क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • जन्मोत्सव शाम को, प्रदोष में मनाएँ, क्योंकि जयंती उसी घड़ी की पूर्णिमा से मानी जाती है।
  • गुरुचरित्र का एक अध्याय या कोई दत्त स्तोत्र ज़रूर पढ़ें, क्योंकि यह दिन गुरु और उनके उपदेश का सम्मान है।
  • सेवा के रूप में गाय या कुत्ते को कुछ खिलाएँ, क्योंकि दोनों दत्तात्रेय के चित्र में उनके साथ होते हैं।
  • हो सके तो गाणगापुर, नरसोबाची वाडी, औदुंबर, गिरनार या पीठापुरम जैसे किसी दत्त क्षेत्र के दर्शन करें, जो दत्त परंपरा में पवित्र माने जाते हैं।

क्या न करें

  • भोजन माँगने आए किसी को ख़ाली हाथ न लौटाएँ; दत्त परंपरा मानती है कि गुरु किसी भी रूप में आ सकते हैं।
  • अगर व्रत रख रहे हैं, तो मांस और शराब से दूर रहें, क्योंकि यह दिन संयम से मनाया जाता है।
  • कुत्तों के साथ कठोरता न करें, क्योंकि दत्तात्रेय के चित्र में वे उनके चरणों में होते हैं।

क्षेत्रीय नाम, और तारीख़ें क्यों अलग होती हैं

पूर्णिमा का महीना पूर्णिमांत और अमांत, दोनों कैलेंडरों में एक ही रहता है, इसलिए हर जगह यह मार्गशीर्ष पूर्णिमा ही है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में इसे दत्त जयंती और बाक़ी जगह दत्तात्रेय जयंती कहते हैं; कर्नाटक के गाणगापुर, महाराष्ट्र के नरसोबाची वाडी और औदुंबर, गुजरात के गिरनार और आंध्र प्रदेश के पीठापुरम में इस दिन भारी भीड़ जुटती है।

जन्मोत्सव प्रदोष में होता है, इसलिए जयंती उस दिन मनाई जाती है जिस दिन शाम को पूर्णिमा हो। जब पूर्णिमा दोपहर में शुरू हो, तो दत्त जयंती पूर्णिमा के स्नान-दान से एक दिन पहले पड़ सकती है, क्योंकि स्नान-दान सूर्योदय से तय होता है। शाम भी अलग-अलग जगह अलग समय पर होती है, इसलिए शहरों के बीच एक दिन का अंतर आ सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

5 सवाल
2026 में दत्तात्रेय जयंती कब है?

2026 में दत्तात्रेय जयंती नई दिल्ली में बुधवार, 23 दिसंबर 2026 को है। अपनी तारीख़ और समय के लिए ऊपर अपना शहर चुनें।

2026 में दत्तात्रेय जयंती के लिए पूर्णिमा कब शुरू और ख़त्म होगी?

भारतीय समय में पूर्णिमा 23 दिसंबर, सुबह 10:47 को शुरू होकर 24 दिसंबर, सुबह 6:58 को ख़त्म होगी। दत्तात्रेय जयंती का दिन वह है जिस दिन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में पूर्णिमा हो। इसीलिए यह 23 दिसंबर को है।

2027 में दत्तात्रेय जयंती कब है?

नई दिल्ली में सोमवार, 13 दिसंबर 2027।

2028 में दत्तात्रेय जयंती कब है?

नई दिल्ली में शुक्रवार, 1 दिसंबर 2028।

अमेरिका या ब्रिटेन में दत्तात्रेय जयंती की तारीख़ अलग क्यों होती है?

दत्तात्रेय जयंती का दिन वह है जिस दिन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में उसकी तिथि, पूर्णिमा, चल रही हो। तिथि पूरी दुनिया में एक ही क्षण शुरू और ख़त्म होती है, पर सूर्यास्त हर जगह अपने समय पर होता है, इसलिए अमेरिका या ब्रिटेन में वह दिन भारत से एक दिन पहले पड़ सकता है। ऊपर के बॉक्स में अपना शहर चुनें, इस पेज की हर तारीख़ और समय उसके लिए निकाला जाएगा।

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9 विस्तृत रिपोर्ट, जिनमें जन्म कुंडली, कुंडली मिलान और वार्षिक भविष्यवाणी हैं।हिंदी, अंग्रेज़ी और हिंग्लिशरिपोर्ट देखें
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