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नई दिल्ली · 2026, 2027, 2028

काल भैरव जयंती 2026
1 दिसंबर 2026

काल भैरव जयंती: शिव का उग्र रूप, काशी के कोतवाल, रात भर पूजा।

मंगलवारअगहन कृष्ण अष्टमीसूर्यास्त के बाद (प्रदोष)
काल भैरव जयंती 2026 · नई दिल्लीमंगलवार, 1 दिसंबरअगहन कृष्ण अष्टमी
अष्टमी शुरू
30 नवंबर–1 दिसंबर की रात 12:12
अष्टमी समाप्त
1 दिसंबर, रात 11:14
कैसे तय होता है
सूर्यास्त के बाद (प्रदोष)
काल भैरव जयंती 2027 · नई दिल्लीशनिवार, 20 नवंबरअगहन कृष्ण अष्टमी
अष्टमी शुरू
20 नवंबर, शाम 7:17
अष्टमी समाप्त
21 नवंबर, शाम 5:20
कैसे तय होता है
तिथि शुरू होने वाले दिन, क्योंकि 2027 में केवल उसी दिन का प्रदोष काल इस तिथि में पड़ता है
हर सुबह का पंचांग, WhatsApp परत्योहारों की तारीख़ और मुहूर्त भी, CosmiqeAI चैनल पर। मुफ़्त।

2026, 2027, 2028 में काल भैरव जयंती

तिथि के समय के साथ
20261 दिसंबरमंगलवार30 नवंबर–1 दिसंबर की रात 12:12 – 1 दिसंबर, रात 11:14
202720 नवंबरशनिवार20 नवंबर, शाम 7:17 – 21 नवंबर, शाम 5:20
20289 नवंबरगुरुवार9 नवंबर, दोपहर 3:40 – 10 नवंबर, दोपहर 2:03

काल भैरव जयंती की तिथि: अगहन कृष्ण अष्टमी, यानी अगहन के कृष्ण पक्ष की अष्टमी। इसलिए इसकी तारीख़ वह दिन है जिस दिन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में यह तिथि चल रही हो। तिथि आधी रात नहीं, किसी भी मिनट पर शुरू और ख़त्म होती है, इसीलिए यही समय दिन तय करता है, और इसीलिए कोई त्योहार दूसरे देश में अलग तारीख़ को पड़ सकता है।

नई दिल्ली के लिए, भारतीय समय में।

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काल भैरव जयंती क्यों मनाते हैं

इसका महत्व

काल भैरव जयंती, जिसे कालभैरव अष्टमी या भैरव अष्टमी भी कहते हैं, शिव के उग्र रूप भैरव के प्रकट होने का दिन है। यह मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को पड़ती है। हर कृष्ण अष्टमी कालाष्टमी होती है, यानी हर महीने भैरव का दिन, पर इसी अष्टमी को उनके प्रकट होने का दिन माना जाता है, इसलिए साल भर में यही सबसे बड़ी है। भक्त व्रत रखते हैं, भैरव मंदिर जाते हैं, सरसों के तेल का दीया जलाते हैं और रात भर जागरण करते हैं।

शिव पुराण की परंपरा में ब्रह्मा के अहंकार पर शिव के क्रोध से भैरव प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट दिया। इस कर्म का पाप उनके पीछे-पीछे चलता रहा, जब तक वे काशी नहीं पहुँचे, जहाँ उन्हें उससे मुक्ति मिली। काशी उन्हें अपना कोतवाल, यानी नगर का रक्षक मानती है, और परंपरा है कि उनके दर्शन के बिना काशी यात्रा पूरी नहीं होती। भय से छुटकारे के लिए उनके उग्र रूप की शरण ली जाती है, और माना जाता है कि वे शरण में आए की रक्षा करते हैं।

पूजा विधि

क्रम से
  1. 1
    स्नान और संकल्प

    सुबह जल्दी स्नान करें, और अगर व्रत रख रहे हैं तो शिव या भैरव के सामने व्रत का संकल्प लें।

  2. 2
    मंदिर जाएँ या प्रतिमा रखें

    भैरव मंदिर जाएँ, या घर पर साफ़ कपड़े पर शिव के साथ भैरव की प्रतिमा या चित्र रखें।

  3. 3
    दीया जलाएँ, भोग लगाएँ

    उनके सामने सरसों के तेल का दीया जलाएँ, और काले तिल, फूल और इमरती या जलेबी जैसी मिठाई चढ़ाएँ, जो उत्तर भारत के बहुत से परिवार भैरव जी को चढ़ाते हैं।

  4. 4
    पाठ और आरती

    आदि शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध कालभैरवाष्टकम् या भैरव चालीसा का पाठ करें, फिर आरती करें।

  5. 5
    कुत्ते को भोजन

    किसी कुत्ते को, हो सके तो काले कुत्ते को, रोटी या कुछ और खिलाएँ; कुत्ता भैरव का वाहन माना जाता है।

  6. 6
    रात्रि जागरण

    रात का कुछ हिस्सा भजन या पाठ में जागकर बिताएँ, क्योंकि यह पर्व रात की अष्टमी का है। व्रत अपने परिवार की रीति के अनुसार रात की पूजा के बाद या अगली सुबह खोलें।

पूजा सामग्री

एक दिन पहले तैयार रखें
  • भैरव की प्रतिमा या चित्र, और शिव का भी
  • सरसों का तेल और मिट्टी का दीया
  • काले तिल
  • फूल और माला
  • भोग के लिए इमरती या जलेबी
  • नारियल
  • रोली और अक्षत
  • अगरबत्ती/धूप और कपूर
  • कुत्ते के लिए रोटी या भोजन
  • भैरव चालीसा या कालभैरवाष्टकम्

काल भैरव जयंती की कथा

स्रोत: शिव पुराण की परंपरा; काशी वाला प्रसंग जैसा वाराणसी में सुनाया जाता है

उस समय ब्रह्मा के पाँच सिर थे। उन्हें अहंकार हो गया और वे शिव का अपमान करते हुए स्वयं को सबसे बड़ा बताने लगे। शिव के क्रोध से एक उग्र रूप प्रकट हुआ: भैरव, जिनका रूप श्याम और भयंकर था। उन्होंने अपने नाख़ून से ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट दिया, वही सिर जिसने अहंकार में बात की थी।

पर ब्रह्मा पर प्रहार ब्रह्महत्या जैसा बड़ा पाप था, और वह कपाल भैरव के हाथ से चिपक गया। वे भिक्षु बनकर एक तीर्थ से दूसरे तीर्थ घूमते रहे, उसी कपाल को भिक्षापात्र बनाए, और वह पाप जहाँ-जहाँ वे गए, उनके पीछे-पीछे चलता रहा।

आख़िर जब वे काशी पहुँचे, तो वह पाप नगर के भीतर उनके पीछे नहीं आ सका, और कपाल उनके हाथ से छूटकर गिर गया; वाराणसी उस स्थान को कपाल मोचन के नाम से याद करती है। तब शिव ने भैरव को काशी का कोतवाल, यानी नगर का रक्षक बना दिया। काशी की परंपरा कहती है कि उनकी आज्ञा के बिना कोई इस नगरी में नहीं रह सकता, और वहाँ आज भी उनकी पूजा होती है।

क्या करें, क्या न करें

क्या करें

  • सरसों के तेल का दीया शाम या रात को जलाएँ, क्योंकि यह अष्टमी उन्हीं घड़ियों की है।
  • किसी कुत्ते को प्यार से खिलाएँ, क्योंकि वह भैरव का वाहन है और माना जाता है कि उसके प्रति दया से वे प्रसन्न होते हैं।
  • कालभैरवाष्टकम् धीरे-धीरे, अर्थ पर ध्यान देते हुए पढ़ें; इसमें भैरव की काशी के स्वामी के रूप में स्तुति है।
  • हो सके तो अपने शहर के काल भैरव मंदिर जाएँ, या काशी यात्रा में वाराणसी के काल भैरव मंदिर, क्योंकि परंपरा है कि नगर के रक्षक के दर्शन ज़रूर किए जाएँ।

क्या न करें

  • कुत्तों को भगाने या चोट पहुँचाने से बचें, ख़ासकर इस दिन, क्योंकि कुत्ता भैरव से जुड़ा पवित्र प्राणी माना जाता है।
  • अगर व्रत रख रहे हैं, तो मांस, शराब और घर में कलह से दूर रहें, क्योंकि यह दिन संयम और प्रार्थना का है।
  • भैरव से डरकर पूजा न करें; परंपरा उनके उग्र रूप को रक्षक मानती है, और उनकी पूजा भक्ति से होती है।

क्षेत्रीय नाम, और तारीख़ें क्यों अलग होती हैं

उत्तर भारत के पूर्णिमांत कैलेंडर में यह मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी है। गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण के अमांत कैलेंडर में, जहाँ महीना अमावस्या पर ख़त्म होता है, यही दिन कार्तिक कृष्ण अष्टमी कहलाता है: रात वही है, बस महीने का नाम अलग है। इसे काल भैरव जयंती, कालभैरव जयंती, भैरव अष्टमी और कालाष्टमी भी कहते हैं।

यह दिन सूर्योदय की तिथि से नहीं, बल्कि उस अष्टमी से तय होता है जो शाम और रात में रहे। अष्टमी हर जगह एक ही पल शुरू और ख़त्म होती है, पर शाम अलग-अलग जगह अलग समय पर होती है, इसलिए पश्चिम भारत का कोई शहर या विदेश में रहने वाले लोग इसे वाराणसी से एक दिन आगे-पीछे मना सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

5 सवाल
2026 में काल भैरव जयंती कब है?

2026 में काल भैरव जयंती नई दिल्ली में मंगलवार, 1 दिसंबर 2026 को है। अपनी तारीख़ और समय के लिए ऊपर अपना शहर चुनें।

2026 में काल भैरव जयंती के लिए अष्टमी कब शुरू और ख़त्म होगी?

भारतीय समय में अष्टमी 30 नवंबर–1 दिसंबर की रात 12:12 को शुरू होकर 1 दिसंबर, रात 11:14 को ख़त्म होगी। काल भैरव जयंती का दिन वह है जिस दिन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में अष्टमी हो। इसीलिए यह 1 दिसंबर को है।

2027 में काल भैरव जयंती कब है?

नई दिल्ली में शनिवार, 20 नवंबर 2027।

2028 में काल भैरव जयंती कब है?

नई दिल्ली में गुरुवार, 9 नवंबर 2028।

अमेरिका या ब्रिटेन में काल भैरव जयंती की तारीख़ अलग क्यों होती है?

काल भैरव जयंती का दिन वह है जिस दिन सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में उसकी तिथि, अष्टमी, चल रही हो। तिथि पूरी दुनिया में एक ही क्षण शुरू और ख़त्म होती है, पर सूर्यास्त हर जगह अपने समय पर होता है, इसलिए अमेरिका या ब्रिटेन में वह दिन भारत से एक दिन पहले पड़ सकता है। ऊपर के बॉक्स में अपना शहर चुनें, इस पेज की हर तारीख़ और समय उसके लिए निकाला जाएगा।

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