मंगल महादशा के विषय
मेहनत, ज़मीन-जायदाद और विवाद
मंगल · केतु
मंगल महादशा में केतु की अंतर्दशा 4 माह 27 दिन चलती है। यह नौ में से छठी अंतर्दशा है, और महादशा शुरू होने के 4 वर्ष 5 माह 27 दिन बाद आती है।
मंगल के 7 वर्ष × केतु के 7 वर्ष ÷ 120
4 माह 27 दिन · 149 दिन
इससे पहले बुध की अंतर्दशा चलती है, और इसके बाद शुक्र की।
मंगल केतु को सम (न मित्र, न शत्रु) मानते हैं, पर केतु मंगल को मित्र मानते हैं। मंगल–केतु की दशा पढ़ते समय शुरुआत इसी नैसर्गिक संबंध से होती है; यह दशा क्या लाएगी, यह इस पर निर्भर है कि आपकी कुंडली में मंगल और केतु कहाँ बैठे हैं। राहु और केतु की मित्रता पर ग्रंथ एकमत नहीं हैं; यहाँ की कुंडली यही तालिका मानती है।
मेहनत, ज़मीन-जायदाद और विवाद
छोड़ना, अंतर्मुखता और अचानक घटनाएँ
मंगल–केतु का असर, एक-एक क्षेत्र में, सीधे शब्दों में; नीचे दिए पराशर के श्लोकों से
| क्षेत्र | श्लोक क्या कहते हैं |
|---|---|
| काम और प्रतिष्ठा | शुभ हो तो: बड़े लोगों की कृपा और अधिकार मिलता है, प्रतिष्ठा बढ़ती है, और सेनापति जैसा पद व बड़े लोगों से मित्रता मिलती है। |
| धन और संपत्ति | शुभ हो तो: धन, भूमि, पशुधन, वस्त्र, आभूषण और कर्मचारियों के ज़रिए धन मिलता है। |
| परिवार | शुभ हो तो: पुत्र का जन्म होता है; कठिन हो तो: झगड़े होते हैं और जीवनसाथी-संतान को कष्ट होता है। |
| सेहत | कठिन हो तो: दाँतों के रोग, ज्वर, पेचिश, चर्म रोग, और चोर व जंगली जानवरों से कष्ट होता है। |
| धर्म और यात्रा | शुभ हो तो: माँ लक्ष्मी की कृपा होती है और हवन-यज्ञ होते हैं। |
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 54, श्लोक 48–54
पराशर मंगल महादशा में केतु की अंतर्दशा का फल केतु की स्थिति से बताते हैं: लग्न से और मंगल से गिनकर, और केतु किन भावों के स्वामी हैं, इससे; आप पर कौन-सी बात लागू होती है, यह आपकी कुंडली बताती है, और ग्रंथ भले ही पुरुष जातक की बात करता हो, इसके फल हर किसी पर लागू होते हैं।
एक सावधानी: जब केतु आपके दूसरे या सातवें भाव में बैठे हों (ये मारक भाव हैं, जिन्हें शास्त्र प्राणों के संकट से जोड़ते हैं), तब बृहत् पाराशर होरा शास्त्र रोग, अपमान, मानसिक पीड़ा और धन की हानि की चेतावनी देता है और सावधानी रखने को कहता है। श्लोक 54.52–54
इन श्लोकों में मंगल महादशा में केतु की अंतर्दशा का अपना कोई उपाय नहीं दिया गया; केतु के रोज़ के उपाय नीचे हैं।
हर लग्न के लिए मंगल क्या हैं, जैसा पराशर ने बताया है; केतु अपनी राशि के स्वामी के अनुसार फल देते हैं
तालिका के नाम, बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 से:
| लग्न | मंगल (किन भावों के स्वामी) |
|---|---|
| मेष | शुभ पहले और आठवें भाव |
| वृषभ | मारक सातवें और बारहवें भाव |
| मिथुन | अशुभ छठे और ग्यारहवें भाव |
| कर्क | योगकारक पाँचवें और दसवें भाव |
| सिंह | योगकारक चौथे और नौवें भाव |
| कन्या | अशुभ तीसरे और आठवें भाव |
| तुला | अशुभ · मारक दूसरे और सातवें भाव |
| वृश्चिक | तटस्थ पहले और छठे भाव |
| धनु | शुभ पाँचवें और बारहवें भाव |
| मकर | अशुभ · मारक— चौथे और ग्यारहवें भाव के स्वामी, दूसरे या सातवें के नहीं; फिर भी श्लोक 34.39–40 इन्हें मारक कहता है चौथे और ग्यारहवें भाव |
| कुंभ | अशुभ · मारक— तीसरे और दसवें भाव के स्वामी, दूसरे या सातवें के नहीं; फिर भी श्लोक 34.41–42 इन्हें मारक कहता है तीसरे और दसवें भाव |
| मीन | शुभ · योग— गुरु के साथ योग देते हैं (34.44)— साथ ही मारक भी कहे गए, पर अपने आप मारक नहीं (34.44) दूसरे और नौवें भाव |
केतु किसी भाव के स्वामी नहीं, इसलिए कोई लग्न इन्हें अपने आप शुभ या अशुभ नहीं बनाता: ये जिस भाव में बैठें, उसका और उस राशि के स्वामी का फल देते हैं। कैसे, यह हर भाव में केतु वाले पेज पर देखें।
एक कुंडली जिसमें मंगल–केतु 50 वर्ष की उम्र में आती है, उसी तरह पढ़ी हुई जैसे रिपोर्ट आपकी पढ़ती है
जन्म कुंडली रिपोर्ट से
मंगल आपके दूसरे और सातवें भाव के स्वामी हैं और सातवें भाव में बैठे हैं: यह काल उन विषयों को आगे लाता है — हाथ का पैसा, परिवार और बोलचाल; जीवनसाथी, साझेदार और लेन-देन के साथी। मिला-जुला — केंद्र या त्रिकोण और अपनी राशि में बलवान; दूसरी तरफ़: षड्बल कम और नवांश में शत्रु की राशि में।
इस कुंडली में यह 10 नवंबर 2040 – 8 अप्रैल 2041 चलती है, 50 वर्ष की उम्र में। यहाँ इसकी अवधि ऊपर बताई अवधि से एक दिन कम-ज़्यादा हो सकती है, क्योंकि हर कुंडली की तारीख़ें दिन तक पूरी की जाती हैं।
केतु: दसवें भाव में। यह लाती है: काम, प्रतिष्ठा और अपने से बड़े अधिकारी। मिला-जुला — केंद्र या त्रिकोण और मंगल से अच्छी स्थिति में; दूसरी तरफ़: राशि के स्वामी कमज़ोर।
षड्बल: ग्रह के बल का छह तरह से किया गया माप, जो रिपोर्ट निकालती है; “षड्बल कम” का अर्थ है कि ग्रह का बल ग्रंथों की माँग से कम है। नवांश: कुंडली का नौवाँ भाग-चार्ट, जिससे ग्रह का भीतरी बल देखा जाता है।
मंगल–केतु नौ प्रत्यंतर दशाओं में बँटती है, केतु की अपनी से शुरू होकर। हर अवधि उसके साथ लिखी तारीख़ों के बीच गिनी गई है, और किसी भी कुंडली में एक-आध दिन के अंतर से यही रहती है; तारीख़ें और फल इसी कुंडली के हैं।
| प्रत्यंतर | अवधि | इस कुंडली में | रिपोर्ट का फल |
|---|---|---|---|
| केतु | 8 दिन | 10 नवंबर 2040 – 18 नवंबर 2040 | मिला-जुला |
| शुक्र | 25 दिन | 18 नवंबर 2040 – 13 दिसंबर 2040 | मिला-जुला |
| सूर्य | 8 दिन | 13 दिसंबर 2040 – 21 दिसंबर 2040 | खुलती है |
| चंद्र | 12 दिन | 21 दिसंबर 2040 – 2 जनवरी 2041 | मिला-जुला |
| मंगल | 9 दिन | 2 जनवरी 2041 – 11 जनवरी 2041 | मिला-जुला |
| राहु | 22 दिन | 11 जनवरी 2041 – 2 फ़रवरी 2041 | खुलती है |
| गुरु | 20 दिन | 2 फ़रवरी 2041 – 22 फ़रवरी 2041 | सावधानी |
| शनि | 24 दिन | 22 फ़रवरी 2041 – 18 मार्च 2041 | मिला-जुला |
| बुध | 21 दिन | 18 मार्च 2041 – 8 अप्रैल 2041 | सावधानी |
आपकी अपनी मंगल–केतु की तारीख़ें दशा कैलकुलेटर मुफ़्त बताता है, और जन्म कुंडली रिपोर्ट आपकी अंतर्दशाएँ इसी तरह पढ़ती है, साथ में चल रही अंतर्दशा की प्रत्यंतर दशाएँ भी।
केतु के महीनों के लिए सुझाव; आपको इनकी कितनी ज़रूरत है, यह आपकी कुंडली बताएगी
पराशर के श्लोक मंगल–केतु का अपना कोई उपाय नहीं बताते, इसलिए केतु के रोज़ के उपाय ही काम आते हैं।
ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः
मंगलवार को कंबल और तिल का दान
केतु की किसी भी दशा में क्या करें और किससे बचें: केतु महादशा। इनके व्रत, रत्न, स्तोत्र और पूजा: केतु के उपाय।
4 माह 27 दिन (149 दिन): मंगल के 7 वर्ष × केतु के 7 वर्ष ÷ 120। मंगल महादशा शुरू होने के 4 वर्ष 5 माह 27 दिन बाद यह आती है।
पहले से नहीं कहा जा सकता: यह आपके लग्न पर और इस पर निर्भर है कि आपकी कुंडली में मंगल और केतु कहाँ बैठे हैं। केतु किसी लग्न के लिए अपने आप शुभ या अशुभ नहीं होते; ये जिस राशि में बैठें, उसके स्वामी का फल देते हैं। मंगल मेष, कर्क, सिंह, धनु, मीन लग्न के लिए शुभ हैं। वृषभ, मिथुन, कन्या, तुला, मकर, कुंभ लग्न के लिए मंगल कठिन हैं। स्वभाव से इनकी मित्रता एक जैसी नहीं: मंगल केतु को सम मानते हैं, और केतु मंगल को मित्र। ऊपर की तुला लग्न वाली कुंडली पर जन्म कुंडली रिपोर्ट इसे “मिला-जुला” पढ़ती है, जैसा ऊपर उसके चिह्न में लिखा है।
नौ, इस क्रम में: केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध। हर एक की अवधि = मंगल–केतु की अवधि × प्रत्यंतर के ग्रह के वर्ष ÷ 120, इसलिए सबसे लंबी शुक्र की है, लगभग 25 दिन, और सबसे छोटी सूर्य की, लगभग 8 दिन।
केतु का बीज मंत्र ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः और मंगलवार को कंबल और तिल का दान मंगल–केतु के रोज़ के उपाय हैं, जहाँ आपकी कुंडली इनकी ज़रूरत दिखाए।
यह जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र से निकलती है। जन्म विवरण भरें, और पूरी 120 वर्ष की समय-रेखा आ जाएगी, हर दशा का फल आपकी कुंडली के हिसाब से।
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