मंगल महादशा के विषय
मेहनत, ज़मीन-जायदाद और विवाद
मंगल · शनि
मंगल महादशा में शनि की अंतर्दशा 1 वर्ष 1 माह 9 दिन चलती है। यह नौ में से चौथी अंतर्दशा है, और महादशा शुरू होने के 2 वर्ष 4 माह 21 दिन बाद आती है।
मंगल के 7 वर्ष × शनि के 19 वर्ष ÷ 120
1 वर्ष 1 माह 9 दिन · 405 दिन
इससे पहले गुरु की अंतर्दशा चलती है, और इसके बाद बुध की।
मंगल शनि को सम (न मित्र, न शत्रु) मानते हैं, पर शनि मंगल को शत्रु मानते हैं। मंगल–शनि की दशा पढ़ते समय शुरुआत इसी नैसर्गिक संबंध से होती है; यह दशा क्या लाएगी, यह इस पर निर्भर है कि आपकी कुंडली में मंगल और शनि कहाँ बैठे हैं।
मेहनत, ज़मीन-जायदाद और विवाद
कड़ी मेहनत, कर्तव्य और देरी
मंगल–शनि का असर, एक-एक क्षेत्र में, सीधे शब्दों में; नीचे दिए पराशर के श्लोकों से
| क्षेत्र | श्लोक क्या कहते हैं |
|---|---|
| काम और प्रतिष्ठा | शुभ हो तो: बड़े लोगों से मान मिलता है और प्रतिष्ठा बढ़ती है; कठिन हो तो: विदेशी अधिकारियों से परेशानी, कारावास का भय, और मान-सम्मान व पद की हानि होती है। |
| धन और संपत्ति | शुभ हो तो: धन, अन्न और गायों की संख्या बढ़ती है; कठिन हो तो: धन की हानि, खेती में कमी और ज़मीन बेचने में घाटा होता है। |
| परिवार | शुभ हो तो: संतान और पौत्र-पौत्रियों से सुख मिलता है; कठिन हो तो: शत्रुओं और अपने परिवार के लोगों से भी ख़तरा रहता है। |
| सेहत | कठिन हो तो: रोग, मानसिक पीड़ा, मूत्र रोग, गठिया और प्राण-संकट तक का भय रहता है। |
| धर्म और यात्रा | कठिन हो तो: परदेस यात्रा करनी पड़ती है। |
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 54, श्लोक 23–35
पराशर मंगल महादशा में शनि की अंतर्दशा का फल शनि की स्थिति से बताते हैं: लग्न से और मंगल से गिनकर, और शनि किन भावों के स्वामी हैं, इससे; आप पर कौन-सी बात लागू होती है, यह आपकी कुंडली बताती है, और ग्रंथ भले ही पुरुष जातक की बात करता हो, इसके फल हर किसी पर लागू होते हैं।
भगवान शिव की कृपा से राहत के लिए बृहत् पाराशर होरा शास्त्र विधिपूर्वक महामृत्युंजय जप बताता है।
श्लोक 54.33–35एक सावधानी: जब शनि आपके दूसरे या सातवें भाव के स्वामी हों और पाप ग्रहों के साथ हों, तब बृहत् पाराशर होरा शास्त्र इसे गंभीर मारक (जिसे शास्त्र प्राणों के संकट से जोड़ते हैं) काल मानता है। वह बड़े संकट और प्राण भय की, शासन के क्रोध और दंड की, मानसिक पीड़ा, चोरों और आग से भय, भाई-बहनों से जुड़ी हानि, परिवार में फूट, पशुधन की हानि, जीवनसाथी और संतान को कष्ट, और कारावास के भय की चेतावनी देता है। वह बहुत सावधानी रखने को कहता है। श्लोक 54.27–29½
हर लग्न के लिए मंगल और शनि क्या हैं, जैसा पराशर ने बताया है, और दोनों मिलकर
मेष, वृषभ, कर्क, सिंह, तुला, धनु, कुंभ, मीन लग्न के लिए एक शुभ है और दूसरा कठिन, इसलिए यह दशा मिला-जुला फल देती है। जहाँ दोनों में से एक तटस्थ हो, वहाँ दूसरा झुकाव तय करता है: मिथुन, कन्या, वृश्चिक, मकर के लिए कठिन की ओर।
तालिका के नाम, बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 से:
| लग्न | मंगल (किन भावों के स्वामी) | शनि (किन भावों के स्वामी) | दोनों मिलकर |
|---|---|---|---|
| मेष | शुभ पहले और आठवें भाव | अशुभ दसवें और ग्यारहवें भाव | मिला-जुला |
| वृषभ | मारक सातवें और बारहवें भाव | योगकारक नौवें और दसवें भाव | मिला-जुला |
| मिथुन | अशुभ छठे और ग्यारहवें भाव | तटस्थ आठवें और नौवें भाव | कठिन की ओर |
| कर्क | योगकारक पाँचवें और दसवें भाव | मारक सातवें और आठवें भाव | मिला-जुला |
| सिंह | योगकारक चौथे और नौवें भाव | अशुभ · मारक छठे और सातवें भाव | मिला-जुला |
| कन्या | अशुभ तीसरे और आठवें भाव | तटस्थ पाँचवें और छठे भाव | कठिन की ओर |
| तुला | अशुभ · मारक दूसरे और सातवें भाव | योगकारक चौथे और पाँचवें भाव | मिला-जुला |
| वृश्चिक | तटस्थ पहले और छठे भाव | अशुभ तीसरे और चौथे भाव | कठिन की ओर |
| धनु | शुभ पाँचवें और बारहवें भाव | मारक दूसरे और तीसरे भाव | मिला-जुला |
| मकर | अशुभ · मारक— चौथे और ग्यारहवें भाव के स्वामी, दूसरे या सातवें के नहीं; फिर भी श्लोक 34.39–40 इन्हें मारक कहता है चौथे और ग्यारहवें भाव | तटस्थ— लग्नेश; श्लोक 34.39 के अनुसार अपने आप मारक नहीं पहले और दूसरे भाव | कठिन की ओर |
| कुंभ | अशुभ · मारक— तीसरे और दसवें भाव के स्वामी, दूसरे या सातवें के नहीं; फिर भी श्लोक 34.41–42 इन्हें मारक कहता है तीसरे और दसवें भाव | शुभ— लग्नेश, जिन्हें श्लोक 34.41 स्वयं कुंभ के लिए शुभ बताता है पहले और बारहवें भाव | मिला-जुला |
| मीन | शुभ · योग— गुरु के साथ योग देते हैं (34.44)— साथ ही मारक भी कहे गए, पर अपने आप मारक नहीं (34.44) दूसरे और नौवें भाव | अशुभ · मारक— ग्यारहवें और बारहवें भाव के स्वामी, दूसरे या सातवें के नहीं; फिर भी श्लोक 34.43–44 इन्हें मारक कहता है ग्यारहवें और बारहवें भाव | मिला-जुला |
“दोनों मिलकर” मंगल और शनि को साथ रखकर पढ़ता है: दोनों शुभ हों तो अनुकूल; एक शुभ और एक तटस्थ हो तो अनुकूल की ओर; एक शुभ और एक कठिन हो तो मिला-जुला; एक कठिन और एक तटस्थ हो तो कठिन की ओर; दोनों कठिन हों तो कठिन; और दोनों तटस्थ हों तो स्थिति तय करती है। योग की जोड़ी वे दो ग्रह हैं जिन्हें पराशर उस लग्न के लिए साथ में नाम लेकर बताते हैं।
एक कुंडली जिसमें मंगल–शनि 48 वर्ष की उम्र में आती है, उसी तरह पढ़ी हुई जैसे रिपोर्ट आपकी पढ़ती है
जन्म कुंडली रिपोर्ट से
मंगल आपके दूसरे और सातवें भाव के स्वामी हैं और सातवें भाव में बैठे हैं: यह काल उन विषयों को आगे लाता है — हाथ का पैसा, परिवार और बोलचाल; जीवनसाथी, साझेदार और लेन-देन के साथी। मिला-जुला — केंद्र या त्रिकोण और अपनी राशि में बलवान; दूसरी तरफ़: षड्बल कम और नवांश में शत्रु की राशि में।
इस कुंडली में यह 5 अक्टूबर 2038 – 13 नवंबर 2039 चलती है, 48 से 49 वर्ष की उम्र तक। यहाँ इसकी अवधि ऊपर बताई अवधि से एक दिन कम-ज़्यादा हो सकती है, क्योंकि हर कुंडली की तारीख़ें दिन तक पूरी की जाती हैं।
शनि: चौथे और पाँचवें भाव के स्वामी, तीसरे भाव में। यह लाती है: घर, माँ, ज़मीन, वाहन और आराम; संतान, पढ़ाई और अपनी रचना। अनुकूल — त्रिकोण का स्वामी, मंगल से अच्छी स्थिति में और वर्गोत्तम; दूसरी तरफ़: षड्बल कम।
षड्बल: ग्रह के बल का छह तरह से किया गया माप, जो रिपोर्ट निकालती है; “षड्बल कम” का अर्थ है कि ग्रह का बल ग्रंथों की माँग से कम है। वर्गोत्तम: जन्म कुंडली और नवांश दोनों में एक ही राशि में, जिससे ग्रह बलवान होता है। नवांश: कुंडली का नौवाँ भाग-चार्ट, जिससे ग्रह का भीतरी बल देखा जाता है।
मंगल–शनि नौ प्रत्यंतर दशाओं में बँटती है, शनि की अपनी से शुरू होकर। हर अवधि उसके साथ लिखी तारीख़ों के बीच गिनी गई है, और किसी भी कुंडली में एक-आध दिन के अंतर से यही रहती है; तारीख़ें और फल इसी कुंडली के हैं।
| प्रत्यंतर | अवधि | इस कुंडली में | रिपोर्ट का फल |
|---|---|---|---|
| शनि | 2 माह 3 दिन | 5 अक्टूबर 2038 – 8 दिसंबर 2038 | मिला-जुला |
| बुध | 1 माह 26 दिन | 8 दिसंबर 2038 – 3 फ़रवरी 2039 | सावधानी |
| केतु | 24 दिन | 3 फ़रवरी 2039 – 27 फ़रवरी 2039 | सावधानी |
| शुक्र | 2 माह 8 दिन | 27 फ़रवरी 2039 – 5 मई 2039 | मिला-जुला |
| सूर्य | 20 दिन | 5 मई 2039 – 25 मई 2039 | खुलती है |
| चंद्र | 1 माह 3 दिन | 25 मई 2039 – 28 जून 2039 | मिला-जुला |
| मंगल | 24 दिन | 28 जून 2039 – 22 जुलाई 2039 | मिला-जुला |
| राहु | 1 माह 29 दिन | 22 जुलाई 2039 – 20 सितंबर 2039 | मिला-जुला |
| गुरु | 1 माह 24 दिन | 20 सितंबर 2039 – 13 नवंबर 2039 | मिला-जुला |
आपकी अपनी मंगल–शनि की तारीख़ें दशा कैलकुलेटर मुफ़्त बताता है, और जन्म कुंडली रिपोर्ट आपकी अंतर्दशाएँ इसी तरह पढ़ती है, साथ में चल रही अंतर्दशा की प्रत्यंतर दशाएँ भी।
शनि के महीनों के लिए सुझाव; आपको इनकी कितनी ज़रूरत है, यह आपकी कुंडली बताएगी
पराशर मंगल–शनि का अपना उपाय बताते हैं (श्लोक 54.33–35), जो ऊपर “पराशर का उपाय” में दिया है; पहले वही।
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
शनिवार को काले तिल और लोहे का दान
शनि की किसी भी दशा में क्या करें और किससे बचें: शनि महादशा। इनके व्रत, रत्न, स्तोत्र और पूजा: शनि के उपाय।
1 वर्ष 1 माह 9 दिन (405 दिन): मंगल के 7 वर्ष × शनि के 19 वर्ष ÷ 120। मंगल महादशा शुरू होने के 2 वर्ष 4 माह 21 दिन बाद यह आती है।
पहले से नहीं कहा जा सकता: यह आपके लग्न पर और इस पर निर्भर है कि आपकी कुंडली में मंगल और शनि कहाँ बैठे हैं। पराशर की सूची के अनुसार किसी लग्न के लिए दोनों स्वामी शुभ नहीं हैं। स्वभाव से इनकी मित्रता एक जैसी नहीं: मंगल शनि को सम मानते हैं, और शनि मंगल को शत्रु। ऊपर की तुला लग्न वाली कुंडली पर जन्म कुंडली रिपोर्ट इसे “खुलती है” पढ़ती है, जैसा ऊपर उसके चिह्न में लिखा है।
नौ, इस क्रम में: शनि, बुध, केतु, शुक्र, सूर्य, चंद्र, मंगल, राहु, गुरु। हर एक की अवधि = मंगल–शनि की अवधि × प्रत्यंतर के ग्रह के वर्ष ÷ 120, इसलिए सबसे लंबी शुक्र की है, लगभग 2 माह 8 दिन, और सबसे छोटी सूर्य की, लगभग 20 दिन।
पराशर इस अंतर्दशा का अपना उपाय भी बताते हैं (श्लोक 54.33–35), जो ऊपर “पराशर का उपाय” में दिया है। शनि का बीज मंत्र ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः और शनिवार को काले तिल और लोहे का दान मंगल–शनि के रोज़ के उपाय हैं, जहाँ आपकी कुंडली इनकी ज़रूरत दिखाए।
यह जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र से निकलती है। जन्म विवरण भरें, और पूरी 120 वर्ष की समय-रेखा आ जाएगी, हर दशा का फल आपकी कुंडली के हिसाब से।
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