यहाँ पढ़ें कि पहले भाव में मंगल लाल किताब और फलदीपिका के अनुसार क्या फल देते हैं, इसका उपाय क्या है, यहाँ से वे किन भावों को देखते हैं और हर लग्न के लिए इसका क्या मतलब है।
पहले भाव में मंगल मज़बूत शरीर, साहस और दबंग नेतृत्व देते हैं। ग़ुस्सा जल्दी आता है।
लग्न में, यानी पहले भाव में, मंगल का होना उन छह स्थितियों में से एक है जिनसे मंगल दोष बनता है (पहले, दूसरे, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें भाव); यह दोष चंद्र से भी देखा जाता है, और कई कुंडलियों में यह कट जाता है। अपनी कुंडली में मंगल दोष देखें।
मंगल केंद्र (कुंडली के चार कोने, यानी पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ भाव, जहाँ ग्रह सबसे ज़ोर से फल देते हैं) में मेष, वृश्चिक या मकर राशि में हों तो रुचक योग, यानी बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के पाँच महापुरुष योगों में से एक, बनाते हैं। नीचे की तालिका में वे लग्न दिखाए गए हैं जिनमें ऐसा होता है।
लाल किताब पहले भाव में मंगल को भाव से पढ़ती है, आपके लग्न से नहीं; आपके अपने लग्न के लिए पराशर का मत आगे है, और फलदीपिका व बृहज्जातक का फल अलग हो सकता है। लाल किताब और पराशर में फ़र्क · लाल किताब: पक्का घर, ऋण और उपाय
रोज़ कुत्ते को मीठी रोटी खिलाएँ।
यह पहले भाव में मंगल के लिए लाल किताब का एक उपाय है, यहाँ के शुभ फल को और पक्का करने के लिए; यह एक सुझाव है, और आपकी पूरी कुंडली कोई और उपाय भी माँग सकती है। मंगल के सभी उपाय
फलदीपिका 8.8 के अनुसार लग्न (पहले भाव) में मंगल हों तो स्वभाव बहुत कठोर और दुस्साहसी होता है, और ग्रंथ किसी अंग में चोट का योग बताता है। सावधानी के रूप में ग्रंथ अल्पायु की चेतावनी भी देता है।
इसमें से कितना फलेगा, यह बाक़ी कुंडली पर निर्भर है: मंगल किस राशि में हैं, पहले भाव के स्वामी कहाँ हैं, और कौन-से ग्रह साथ हैं या इसे देखते हैं। पुराने ग्रंथ पुरुष जातक की बात करते हैं; उनके फल हर किसी पर लागू होते हैं।
बृहज्जातक 20.6: पहले भाव में मंगल किसी अंग में चोट देने वाले पढ़े गए हैं।
इसका फल मंगल की अपनी महादशा (7 साल) में और दूसरी महादशाओं के भीतर इनकी अंतर्दशा में सबसे ज़्यादा दिखता है। पहले भाव की बातें उस भाव के स्वामी की दशा में भी सामने आती हैं, जो आपके लग्न पर निर्भर है।
पहले भाव से इनकी दृष्टि (ग्रह की नज़र: ग्रह जिन भावों को देखते हैं, उन पर उनका असर पड़ता है), उन नियमों से जिनसे हमारी कुंडली भावों को तौलती है:
पहला भाव, तनु भाव: आप ख़ुद, शरीर, सेहत और आपकी छवि; यह केंद्र और त्रिकोण भाव (पहला, पाँचवाँ और नौवाँ भाव, भाग्य के भाव) है; इसके कारक (वह ग्रह जो, लग्न कोई भी हो, भाव की बातों के स्वाभाविक सूचक होते हैं) सूर्य हैं। पहला भाव, और उसमें हर ग्रह
| लग्न | मंगल की राशि | वहाँ स्थिति | किन भावों के स्वामी | इस लग्न के लिए |
|---|---|---|---|---|
| मेष | मेष | स्वराशि · रुचक योग | पहले और आठवें भाव | शुभ |
| वृषभ | वृषभ | सम | सातवें और बारहवें भाव | मारक |
| मिथुन | मिथुन | शत्रु राशि | छठे और ग्यारहवें भाव | अशुभ |
| कर्क | कर्क | नीच | पाँचवें और दसवें भाव | योगकारक |
| सिंह | सिंह | मित्र राशि | चौथे और नौवें भाव | योगकारक |
| कन्या | कन्या | शत्रु राशि | तीसरे और आठवें भाव | अशुभ |
| तुला | तुला | सम | दूसरे और सातवें भाव | अशुभ · मारक |
| वृश्चिक | वृश्चिक | स्वराशि · रुचक योग | पहले और छठे भाव | तटस्थ |
| धनु | धनु | मित्र राशि | पाँचवें और बारहवें भाव | शुभ |
| मकर | मकर | उच्च · रुचक योग | चौथे और ग्यारहवें भाव | अशुभ · मारक— चौथे और ग्यारहवें भाव के स्वामी, दूसरे या सातवें के नहीं; फिर भी श्लोक 34.39–40 इन्हें मारक कहता है |
| कुंभ | कुंभ | सम | तीसरे और दसवें भाव | अशुभ · मारक— तीसरे और दसवें भाव के स्वामी, दूसरे या सातवें के नहीं; फिर भी श्लोक 34.41–42 इन्हें मारक कहता है |
| मीन | मीन | मित्र राशि | दूसरे और नौवें भाव | शुभ · योग— गुरु के साथ योग देते हैं (34.44)— साथ ही मारक भी कहे गए, पर अपने आप मारक नहीं (34.44) |
हर राशि में मंगल की स्थिति, और हर लग्न के लिए ये किन भावों के स्वामी हैं, जैसा हमारी मुफ़्त कुंडली पढ़ती है (अध्याय 34); हर भाव पर क्लिक करके पढ़ें कि उसके स्वामी पहले भाव में बैठें तो पराशर क्या कहते हैं। “वहाँ स्थिति” बताती है कि वह राशि मंगल के लिए कैसी है: उच्च, अपनी, मित्र, सम, शत्रु या नीच। “इस लग्न के लिए” पराशर का फ़ैसला है, उन भावों के हिसाब से जिनके ये स्वामी हैं। ये दो अलग सवालों के जवाब हैं, इसलिए सम (मित्रता में) और तटस्थ (लग्न के लिए) दो अलग शब्द हैं।
तालिका के नाम, बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 से:
कर्क लग्न लें। यहाँ मंगल कर्क राशि में (नीच) बैठते हैं और आपके पाँचवें और दसवें भाव के स्वामी हैं, इसलिए कर्क लग्न के लिए ये योगकारक हैं (अध्याय 34)। दोनों अलग दिशा में हैं: नाम बताता है कि ये इस लग्न के लिए क्या करते हैं, राशि बताती है कि इनमें कितना बल है, इसलिए ये अपने नाम जितना शुभ फल नहीं दे पाते, जब तक नीच भंग (नीचता का टूटना) इन्हें न उठाए। ऊपर का लाल किताब फल हर लग्न के लिए एक है; यह पंक्ति वह हिस्सा है जो आपके लग्न के साथ बदलता है।
बृहज्जातक 20.11 बताता है कि ग्रह राशि के हिसाब से अपना कितना शुभ फल देते हैं। मंगल जैसे पाप ग्रह के लिए अनुवादक यह क्रम उलट देते हैं और टीकाकार एकमत नहीं हैं, इसलिए पहले भाव के मंगल को ऊपर की पराशर वाली तालिका से पढ़ें। श्लोक 20.10–11
यह ऊपर की जन्म-स्थिति नहीं: यहाँ मंगल आपकी चंद्र राशि से गिनकर पहले भाव से गुज़र रहे हैं। फलदीपिका पहले भाव को मंगल के गोचर के शुभ भावों में नहीं गिनती (बारहों भाव, मंगल के पेज पर)। हमारी मासिक भविष्यवाणी इसे कठिन पढ़ती है: शरीर का ध्यान रखें: झगड़े, गर्मी और ब्लड प्रेशर।
लाल किताब इसे शुभ स्थिति मानती है; मंगल जिन 6 भावों में अच्छा फल देते हैं, यह उनमें से एक है (बाक़ी तीसरे, पाँचवें, छठे, दसवें और ग्यारहवें भाव)। मेष, वृश्चिक और मकर लग्न के लिए ये राशि से सबसे बलवान हैं; कर्क लग्न के लिए नीच के।
लाल किताब इसके लिए यह उपाय देती है: रोज़ कुत्ते को मीठी रोटी खिलाएँ।
चौथे (माता), सातवें (शादी) और आठवें (आयु) भाव को।
आपकी कुंडली में हर ग्रह कहाँ बैठे हैं, आपके लग्न के लिए किन भावों के स्वामी हैं और कौन-सी दशा चल रही है, इसी से तय होता है कि वे आपके लिए क्या करेंगे। सभी नौ ग्रह देखने के लिए अपनी मुफ़्त कुंडली बनाएँ।
मुफ़्त कुंडली बनाएँ

