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नवग्रह

सूर्य ग्रह

सूर्य कहाँ बली और कहाँ निर्बल हैं, उनके मित्र, वे किन भावों को देखते हैं, हर भाव में और हर लग्न के लिए क्या करते हैं, और उनके उपाय।

रविवार6 वर्ष की महादशा

सूर्य एक नज़र में

राशियाँ, मित्र, दृष्टि और उपाय
स्वराशिसिंह
उच्चमेष
नीचतुला
मूलत्रिकोणसिंह
समबुध
शत्रुशुक्र, शनि
दृष्टिअपने से सातवें भाव पर
दिनरविवार
रंगलाल, नारंगी, सुनहरा
रत्नमाणिक्य
रुद्राक्ष1 मुखी, या 12
बीज मंत्रॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः
महादशा6 वर्ष

उच्च: वह राशि जहाँ ग्रह सबसे बली होते हैं; नीच: जहाँ सबसे निर्बल। मूलत्रिकोण: वह राशि जहाँ ग्रह अपने स्वभाव के सबसे क़रीब काम करते हैं, उच्च से ठीक नीचे। दृष्टि: ग्रह की नज़र; ग्रह जिन भावों को देखते हैं, उन पर उनका असर पड़ता है। मुखी: रुद्राक्ष के दाने पर बनी प्राकृतिक धारियों की गिनती। बीज मंत्र: ग्रह की मूल ध्वनि, जिसे गिनकर जपा जाता है।

किन बातों के कारक हैं

पिता, सरकार, मान-सम्मान, सेहत

किस बात के लिए देखे जाते हैं

आत्मसम्मान, अधिकार और पिता

बली हों तो

पहचान, ज़िम्मेदारी वाला पद, बड़ों और सरकार से साथ

निर्बल या पीड़ित हों तो

अहं का टकराव, बॉस या पिता से अनबन, गर्मी से जुड़ी सेहत

किस तरह के काम

सरकारी नौकरी, प्रशासन, चिकित्सा, नेतृत्व वाले काम

हर भाव में सूर्य

लाल किताब के अनुसार; हर भाव के पेज पर उसका उपाय भी है

लाल किताब बीसवीं सदी की भाव पर टिकी पद्धति है: यह हर कुंडली को ऐसे पढ़ती है मानो मेष लग्न हो, इसलिए इसका "शुभ" या "कठिन" भाव के बारे में है, आपके लग्न के बारे में नहीं। इसका पक्का घर वह भाव है जिसे यह ग्रह का स्थायी घर मानती है। आपके अपने लग्न के लिए ग्रह क्या हैं, इसके लिए आगे पराशर की तालिका देखें। लाल किताब और पराशर की पद्धति दो अलग पद्धतियाँ हैं, जिन्हें साथ रखकर पढ़ा जाता है। लाल किताब: पक्का घर, ऋण और उपाय

भावलाल किताबवहाँ क्या देते हैं
पहला भावशुभपहले भाव में सूर्य नेतृत्व, सरकार की कृपा और राजा जैसा रौब देते हैं। व्यक्ति आत्मविश्वासी और सम्मानित होता है।
दूसरा भावकठिनदूसरे भाव में सूर्य पारिवारिक धन को नुक़सान पहुँचा सकते हैं और पिता से झगड़े करा सकते हैं। आँखें, ख़ासकर दाईं आँख, कमज़ोर हो सकती हैं।
तीसरा भावशुभतीसरे भाव में सूर्य साहस, भाई-बहनों से अच्छे संबंध और अपनी मेहनत से सफलता देते हैं।
चौथा भावकठिनचौथे भाव में सूर्य सरकारी संपत्ति और वाहन देते हैं, पर घर में अशांति और माँ की सेहत की परेशानी दे सकते हैं।
पाँचवाँ भावशुभपाँचवें भाव में सूर्य बुद्धिमान संतान, अच्छा भाग्य और ऊँचा चरित्र देते हैं।
छठा भावशुभछठे भाव में सूर्य शत्रुओं पर जीत और अच्छी सेहत देते हैं, पर मामा की ओर से परेशानी आ सकती है।
सातवाँ भावकठिनसातवें भाव में सूर्य शादी में देरी या जीवनसाथी से मतभेद करा सकते हैं। सरकारी कामकाज में परेशानी आ सकती है।
आठवाँ भावकठिनआठवें भाव में सूर्य पिता से मिलने वाला सुख कम करते हैं, और छिपे नुक़सान और सरकारी जुर्माने करा सकते हैं।
नौवाँ भावशुभनौवें भाव में सूर्य भाग्य, आध्यात्मिक उन्नति और दान-पुण्य वाला स्वभाव देते हैं। पिता का साथ मिलता है।
दसवाँ भावशुभदसवें भाव में सूर्य करियर में ऊँचा पद, अधिकार और सरकार से जुड़ाव देते हैं।
ग्यारहवाँ भावशुभग्यारहवें भाव में सूर्य स्थिर आमदनी और धनी मित्र देते हैं, पर यह सोया हुआ भाव हो सकता है, जिसमें फल देर से मिलते हैं।
बारहवाँ भावकठिनबारहवें भाव में सूर्य ख़र्च, आँखों की तकलीफ़ और सरकारी मामलों में नुक़सान कराते हैं। व्यक्ति जन्मस्थान से दूर रह सकता है।

कुंडली के 12 भाव: हर भाव किस बात का है

फलदीपिका के अनुसार हर भाव में सूर्य

मंत्रेश्वर का ग्रंथ, अध्याय 8, श्लोक के साथ

पुराने ग्रंथ एक स्थिति को अकेले पढ़ते हैं और पुरुष जातक की बात करते हैं, पर इनके फल हर किसी पर लागू होते हैं। असली कुंडली में हर फल में से कितना फलेगा, यह तीन बातों से तय होता है: सूर्य किस राशि में बैठे हैं, उस भाव के स्वामी कहाँ और किस हाल में हैं, और कौन-से ग्रह साथ बैठे हैं या उस भाव को देखते हैं।

पहला भाव

फलदीपिका 8.1 के अनुसार लग्न (पहले भाव) में सूर्य हों तो सिर पर बाल कम होते हैं, शरीर लंबा और दुबला होता है, और स्वभाव अभिमानी, क्रोधी और उतावला होता है। ग्रंथ ऐसे जातक को वीर पर अधीर और कठोर हृदय वाला मानता है, जिसका मन काम में कम लगता है और जिसकी आँखें निर्मल नहीं रहतीं। लग्न कर्क हो और उसमें सूर्य बैठे हों तो फलदीपिका मोतियाबिंद की चेतावनी देती है; मेष लग्न में नेत्र रोग की, सिंह लग्न में रतौंधी की, और तुला लग्न में निर्धनता तथा संतान की हानि की। ये उन राशियों के लिए ग्रंथ की सावधानियाँ हैं। फलदीपिका 8.1

दूसरा भाव

फलदीपिका 8.2 के अनुसार दूसरे भाव (धन और वाणी के भाव) में सूर्य हों तो जातक विद्या, विनय और धन से वंचित रहता है। ग्रंथ यह भी कहता है कि वाणी अटक-अटक कर निकलती है, यानी हकलाहट रहती है। फलदीपिका 8.2

तीसरा भाव

फलदीपिका 8.2 के अनुसार तीसरे भाव (भाई-बहन और पराक्रम के भाव) में सूर्य हों तो जातक बलवान, साहसी, धनवान और उदार होता है। ग्रंथ एक ही कमी बताता है कि अपने संबंधियों से उसका बैर रहता है। फलदीपिका 8.2

चौथा भाव

फलदीपिका 8.2 के अनुसार चौथे भाव (घर, भूमि और सुख के भाव) में सूर्य हों तो सुख, बंधु-बांधव, भूमि, मित्र और अपना घर नहीं मिलते। ग्रंथ यह भी कहता है कि जातक राजसेवा अर्थात् सरकारी सेवा करता है और पिता की संपत्ति ख़र्च कर डालता है। फलदीपिका 8.2

पाँचवाँ भाव

फलदीपिका 8.3 के अनुसार पाँचवें भाव (संतान और बुद्धि के भाव) में सूर्य हों तो सुख, धन और संतान की कमी रहती है, और ग्रंथ अल्पायु की चेतावनी देता है। साथ ही यह योग तीक्ष्ण बुद्धि देता है और जातक को वनों और दूर-दराज़ के प्रदेशों में घुमाता है। फलदीपिका 8.3

छठा भाव

फलदीपिका 8.3 के अनुसार छठे भाव (शत्रु, रोग और प्रतिस्पर्धा के भाव) में सूर्य शुभ फल देते हैं। ग्रंथ इस स्थिति में अधिकार या ऊँचे पद की प्राप्ति, यश, सद्गुण, धन और विरोधियों पर विजय बताता है। फलदीपिका 8.3

सातवाँ भाव

फलदीपिका 8.3 के अनुसार सातवें भाव (विवाह और साझेदारी के भाव) में सूर्य हों तो सत्ताधारियों की अप्रसन्नता झेलनी पड़ती है और शरीर में कोई विकार रहता है। ग्रंथ भटकाव भरा जीवन, अपमान और जीवनसाथी का अभाव भी बताता है। फलदीपिका 8.3

आठवाँ भाव

फलदीपिका 8.3 के अनुसार आठवें भाव (आयु और गुप्त विषयों के भाव) में सूर्य हों तो धन और मित्रों की हानि होती है। सावधानी के रूप में ग्रंथ आयु कम होने की, और नेत्र-ज्योति दुर्बल होने, यहाँ तक कि अंधेपन की भी चेतावनी देता है। फलदीपिका 8.3

नौवाँ भाव

फलदीपिका 8.4 के अनुसार नौवें भाव (पिता, भाग्य और धर्म के भाव) में सूर्य हों तो संतान और बंधु-बांधव मिलते हैं, और जातक देवताओं और ब्राह्मणों का आदर करता है। सावधानी के रूप में ग्रंथ पिता के वियोग की चेतावनी देता है। फलदीपिका 8.4

दसवाँ भाव

फलदीपिका 8.4 के अनुसार दसवें भाव (कर्म और प्रतिष्ठा के भाव) में सूर्य हों तो संतान, वाहन, प्रशंसा, बुद्धि, धन, बल और यश मिलते हैं। ग्रंथ इसे अधिकार और ऊँचे पद तक पहुँचने का लक्षण मानता है। फलदीपिका 8.4

ग्यारहवाँ भाव

फलदीपिका 8.4 के अनुसार ग्यारहवें भाव (लाभ के भाव) में सूर्य हों तो जातक बहुत धनवान और दीर्घायु होता है। ग्रंथ अधिकार की प्राप्ति और शोक से मुक्त जीवन भी बताता है। फलदीपिका 8.4

बारहवाँ भाव

फलदीपिका 8.4 के अनुसार बारहवें भाव (व्यय और हानि के भाव) में सूर्य हों तो जातक का पिता से बैर रहता है। ग्रंथ नेत्र-ज्योति की दुर्बलता, और धन तथा संतान की कमी भी बताता है। फलदीपिका 8.4

हर लग्न के लिए सूर्य

जैसा पराशर ने बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अध्याय 34 में बताया है
लग्नकिन भावों के स्वामीइस लग्न के लिए
मेषपाँचवें भावशुभ
वृषभचौथे भावशुभ
मिथुनतीसरे भावअशुभ
कर्कदूसरे भावमारक
सिंहपहले भावशुभ
कन्याबारहवें भावतटस्थ— साथ बैठे ग्रहों के अनुसार फल देते हैं (34.32)
तुलाग्यारहवें भावअशुभ
वृश्चिकदसवें भावयोगकारक— श्लोक 34.35–36 के अनुसार, नवम भाव के स्वामी चंद्र के साथ
धनुनौवें भावशुभ · योग— बुध के साथ योग देते हैं (34.38)
मकरआठवें भावतटस्थ
कुंभसातवें भावमारक
मीनछठे भावअशुभ

तालिका के नाम, बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 से:

  • योगकारक: लग्न के सबसे शुभ ग्रह: जिन्हें पराशर योग देने वाले बताते हैं, या जो एक साथ केंद्र (पहले, चौथे, सातवें, दसवें) और त्रिकोण (पहले, पाँचवें, नौवें) भाव के स्वामी हों (34.13)
  • शुभ, अशुभ, तटस्थ: लग्न के पक्ष में; कठिन बातें लाने वाले; दोनों में से कोई नहीं
  • लग्नेश: लग्न के अपने स्वामी, जहाँ श्लोक इन्हें शुभ या अशुभ नहीं कहता
  • मारक: जिन्हें पराशर उस लग्न के लिए आयु और सेहत पर भारी बताते हैं; अकेले, या किसी और नाम के बाद लिखे जाते हैं। ये हमेशा दूसरे या सातवें भाव के स्वामी नहीं होते: जहाँ अलग हों, नीचे की पंक्ति श्लोक बताती है
  • · योग: उन दो ग्रहों में से एक जो इस लग्न के लिए साथ मिलकर योग देते हैं

गोचर में सूर्य: चंद्र राशि से हर भाव में

अभी कहाँ से गुज़र रहे हैं, जन्म के समय कहाँ थे यह नहीं

गोचर यानी ग्रह की चाल: सूर्य अभी आपकी चंद्र राशि से गिनकर किस भाव से गुज़र रहे हैं। फलदीपिका सूर्य के गोचर को चंद्र से तीसरे, छठे, दसवें और ग्यारहवें भाव में शुभ मानती है; बाक़ी भावों में सावधानी माँगती है। तीसरा कॉलम बताता है कि हमारी मासिक भविष्यवाणी हर भाव को कैसे पढ़ती है।

गोचरफलदीपिकाहमारी मासिक भविष्यवाणी
चंद्र से पहला—चुनौती भरा: सेहत में कमी, अहं का टकराव, सरकारी काम में अड़चन, थकान
चंद्र से दूसरा—चुनौती भरा: पैसे की तंगी, घर-परिवार की बातें और कड़वे बोल, पर सँभल जाता है
चंद्र से तीसराशुभशुभ: विरोधियों पर जीत, साहस, अच्छी सेहत, भाई-बहनों का साथ
चंद्र से चौथा—चुनौती भरा: चिंता, घर में परेशानी, गाड़ी की दिक़्क़त, माता की सेहत
चंद्र से पाँचवाँ—मिला-जुला: ध्यान लगाने का समय: संतान, पढ़ाई और परीक्षा
चंद्र से छठाशुभशुभ: विरोधियों पर जीत, सेहत में सुधार, क़र्ज़ उतरता है
चंद्र से सातवाँ—मिला-जुला: यात्रा, जीवनसाथी और साझेदारी पर ध्यान, कुछ थकान
चंद्र से आठवाँ—कठिन: सेहत की तकलीफ़ और रुकावटें; बदलाव का समय
चंद्र से नौवाँ—सामान्य: पिता, गुरु, अधिकार और धर्म की बातें; असर बाक़ी कुंडली पर निर्भर
चंद्र से दसवाँशुभशुभ: काम में सफलता, पहचान, अधिकार, करियर में लाभ
चंद्र से ग्यारहवाँशुभबहुत शुभ: धन लाभ, इच्छाएँ पूरी, अच्छी सेहत, ख़ुशी
चंद्र से बारहवाँ—चुनौती भरा: ख़र्च, पूजा-पाठ की ओर मन, विदेश से जुड़ाव, आत्म-चिंतन
आपकी कुंडली में सूर्य कहाँ हैं?एस्ट्रो व्यास आपके लग्न और चल रही दशा के हिसाब से पढ़ते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

5 सवाल
सूर्य किस राशि में उच्च और किसमें नीच होते हैं?

सूर्य मेष में उच्च और तुला में नीच होते हैं, और सिंह के स्वामी हैं।

सूर्य के मित्र और शत्रु कौन हैं?

मित्र: चंद्र, मंगल, गुरु। सम: बुध। शत्रु: शुक्र, शनि।

सूर्य किस लग्न के लिए योगकारक हैं?

वृश्चिक लग्न के लिए, जैसा महर्षि पराशर ने बृहत् पाराशर होरा शास्त्र के अध्याय 34 में बताया है। योगकारक लग्न के लिए सबसे शुभ ग्रह होते हैं। वृश्चिक के लिए: श्लोक 34.35–36 के अनुसार, नवम भाव के स्वामी चंद्र के साथ। धनु लग्न के लिए वे कहते हैं कि सूर्य बुध के साथ योग देते हैं (34.38)।

सूर्य का रत्न और दिन कौन-सा है?

इनका रत्न माणिक्य है और दिन रविवार। रत्न कुंडली दिखाकर ही पहनें।

लाल किताब के अनुसार सूर्य किन भावों में शुभ हैं?

पहले, तीसरे, पाँचवें, छठे, नौवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में।

ग्रह का अर्थ सबके लिए एक है, पर आपकी कुंडली सिर्फ़ आपकी है।

आपकी कुंडली में हर ग्रह कहाँ बैठे हैं, आपके लग्न के लिए किन भावों के स्वामी हैं और कौन-सी दशा चल रही है, इसी से तय होता है कि वे आपके लिए क्या करेंगे। सभी नौ ग्रह देखने के लिए अपनी मुफ़्त कुंडली बनाएँ।

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आपकी कुंडली से रिपोर्ट

9 विस्तृत रिपोर्ट, जिनमें जन्म कुंडली, वार्षिक भविष्यवाणी और मासिक भविष्यवाणी हैं।हिंदी, अंग्रेज़ी और हिंग्लिशरिपोर्ट देखें
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