फलदीपिका 8.1 के अनुसार लग्न (पहले भाव) में सूर्य हों तो सिर पर बाल कम होते हैं, शरीर लंबा और दुबला होता है, और स्वभाव अभिमानी, क्रोधी और उतावला होता है। ग्रंथ ऐसे जातक को वीर पर अधीर और कठोर हृदय वाला मानता है, जिसका मन काम में कम लगता है और जिसकी आँखें निर्मल नहीं रहतीं। लग्न कर्क हो और उसमें सूर्य बैठे हों तो फलदीपिका मोतियाबिंद की चेतावनी देती है; मेष लग्न में नेत्र रोग की, सिंह लग्न में रतौंधी की, और तुला लग्न में निर्धनता तथा संतान की हानि की। ये उन राशियों के लिए ग्रंथ की सावधानियाँ हैं। फलदीपिका 8.1
फलदीपिका 8.2 के अनुसार दूसरे भाव (धन और वाणी के भाव) में सूर्य हों तो जातक विद्या, विनय और धन से वंचित रहता है। ग्रंथ यह भी कहता है कि वाणी अटक-अटक कर निकलती है, यानी हकलाहट रहती है। फलदीपिका 8.2
फलदीपिका 8.2 के अनुसार तीसरे भाव (भाई-बहन और पराक्रम के भाव) में सूर्य हों तो जातक बलवान, साहसी, धनवान और उदार होता है। ग्रंथ एक ही कमी बताता है कि अपने संबंधियों से उसका बैर रहता है। फलदीपिका 8.2
फलदीपिका 8.2 के अनुसार चौथे भाव (घर, भूमि और सुख के भाव) में सूर्य हों तो सुख, बंधु-बांधव, भूमि, मित्र और अपना घर नहीं मिलते। ग्रंथ यह भी कहता है कि जातक राजसेवा अर्थात् सरकारी सेवा करता है और पिता की संपत्ति ख़र्च कर डालता है। फलदीपिका 8.2
फलदीपिका 8.3 के अनुसार पाँचवें भाव (संतान और बुद्धि के भाव) में सूर्य हों तो सुख, धन और संतान की कमी रहती है, और ग्रंथ अल्पायु की चेतावनी देता है। साथ ही यह योग तीक्ष्ण बुद्धि देता है और जातक को वनों और दूर-दराज़ के प्रदेशों में घुमाता है। फलदीपिका 8.3
फलदीपिका 8.3 के अनुसार छठे भाव (शत्रु, रोग और प्रतिस्पर्धा के भाव) में सूर्य शुभ फल देते हैं। ग्रंथ इस स्थिति में अधिकार या ऊँचे पद की प्राप्ति, यश, सद्गुण, धन और विरोधियों पर विजय बताता है। फलदीपिका 8.3
फलदीपिका 8.3 के अनुसार सातवें भाव (विवाह और साझेदारी के भाव) में सूर्य हों तो सत्ताधारियों की अप्रसन्नता झेलनी पड़ती है और शरीर में कोई विकार रहता है। ग्रंथ भटकाव भरा जीवन, अपमान और जीवनसाथी का अभाव भी बताता है। फलदीपिका 8.3
फलदीपिका 8.3 के अनुसार आठवें भाव (आयु और गुप्त विषयों के भाव) में सूर्य हों तो धन और मित्रों की हानि होती है। सावधानी के रूप में ग्रंथ आयु कम होने की, और नेत्र-ज्योति दुर्बल होने, यहाँ तक कि अंधेपन की भी चेतावनी देता है। फलदीपिका 8.3
फलदीपिका 8.4 के अनुसार नौवें भाव (पिता, भाग्य और धर्म के भाव) में सूर्य हों तो संतान और बंधु-बांधव मिलते हैं, और जातक देवताओं और ब्राह्मणों का आदर करता है। सावधानी के रूप में ग्रंथ पिता के वियोग की चेतावनी देता है। फलदीपिका 8.4
फलदीपिका 8.4 के अनुसार दसवें भाव (कर्म और प्रतिष्ठा के भाव) में सूर्य हों तो संतान, वाहन, प्रशंसा, बुद्धि, धन, बल और यश मिलते हैं। ग्रंथ इसे अधिकार और ऊँचे पद तक पहुँचने का लक्षण मानता है। फलदीपिका 8.4
फलदीपिका 8.4 के अनुसार ग्यारहवें भाव (लाभ के भाव) में सूर्य हों तो जातक बहुत धनवान और दीर्घायु होता है। ग्रंथ अधिकार की प्राप्ति और शोक से मुक्त जीवन भी बताता है। फलदीपिका 8.4
फलदीपिका 8.4 के अनुसार बारहवें भाव (व्यय और हानि के भाव) में सूर्य हों तो जातक का पिता से बैर रहता है। ग्रंथ नेत्र-ज्योति की दुर्बलता, और धन तथा संतान की कमी भी बताता है। फलदीपिका 8.4