फलदीपिका 8.20 के अनुसार शनि अपनी उच्च राशि या अपनी राशि को छोड़कर किसी और राशि में लग्न (पहले भाव) में हों तो जातक को बचपन से ही दुःख व कष्ट मिलते हैं और निर्धनता रहती है। ग्रंथ उसे अव्यवस्थित और आलसी भी बताता है। यदि लग्न तुला हो, जहाँ शनि उच्च के होते हैं, या मकर अथवा कुंभ हो, जो उनकी अपनी राशियाँ हैं, तो फलदीपिका के अनुसार फल उलट जाता है: जातक सत्ता में बैठे लोगों के बराबर प्रतिष्ठा पाता है और किसी नगर का मुखिया या प्रधान बनता है। फलदीपिका 8.20
फलदीपिका 8.21 के अनुसार दूसरे भाव (धन और वाणी के भाव) में शनि हों तो चेहरा आकर्षक नहीं होता, धन की कमी रहती है और जातक गलत राह पर चल सकता है। ग्रंथ यह भी कहता है कि बाद की आयु में वह परदेस में बसता है और वहाँ उसे वाहन, धन और सुख-साधन मिलते हैं। फलदीपिका 8.21
फलदीपिका 8.21 के अनुसार तीसरे भाव (भाई-बहन और पराक्रम के भाव) में शनि हों तो जातक बहुत बुद्धिमान, दान में उदार और जीवनसाथी के साथ सुखी रहता है। फिर भी ग्रंथ कहता है कि उसमें आलस्य रहता है और मन पर दुःख का बोझ रहता है। फलदीपिका 8.21
फलदीपिका 8.22 चौथे भाव (घर, माता और सुख के भाव) में शनि को घर-परिवार के सुख के लिए कठिन मानती है। ग्रंथ अपने घर व वाहन के अभाव और बचपन में रोगी रहने की बात कहता है। साथ ही वह इस स्थिति में माता से वंचित होने की चेतावनी देता है। फलदीपिका 8.22
फलदीपिका 8.22 के अनुसार पाँचवें भाव (संतान और बुद्धि के भाव) में शनि हों तो जातक इधर-उधर भटकता है और उसका मन अशांत और भ्रमित रहता है। ग्रंथ संतान, धन और सुख के अभाव की बात कहता है, और ऐसे जातक को विश्वासघाती और दुर्बुद्धि बताता है। फलदीपिका 8.22
फलदीपिका 8.22 के अनुसार छठे भाव (शत्रु और रोग के भाव) में शनि हों तो जातक भोजन बहुत करता है और धनवान होता है। ग्रंथ कहता है कि शत्रु उस पर हावी रह सकते हैं, और उसे हठी और स्वाभिमानी बताता है। फलदीपिका 8.22
फलदीपिका 8.22 सातवें भाव (विवाह और साझेदारी के भाव) में शनि को दांपत्य जीवन के लिए कठिन मानती है। ग्रंथ के अनुसार जीवनसाथी अनुकूल नहीं मिलता, और निर्धनता, भटकाव और कष्ट रहते हैं। फलदीपिका 8.22
फलदीपिका 8.23 आठवें भाव (आयु और गुप्त विषयों के भाव) में शनि की स्थिति को कठिन मानती है। ग्रंथ अस्वच्छता, धन के अभाव, बवासीर, कठोर मन, भूख के कष्ट और मित्रों से तिरस्कार की बात कहता है। फलदीपिका 8.23
फलदीपिका 8.24 के अनुसार नौवें भाव (पिता, भाग्य और धर्म के भाव) में शनि हों तो भाग्य, धन, संतान और पुण्य कमज़ोर पड़ते हैं। ग्रंथ पिता से वंचित होने की चेतावनी देता है और जातक को दुष्ट प्रवृत्ति वाला बताता है। फलदीपिका 8.24
फलदीपिका 8.24 के अनुसार दसवें भाव (कर्म और प्रतिष्ठा के भाव) में शनि हों तो जातक सत्ता में ऊँचा स्थान पाता है या सत्ता में बैठे लोगों का मंत्री बनता है। ग्रंथ इस स्थिति को खेती और भूमि के काम से जोड़ता है, और जातक को साहसी, धनवान और प्रसिद्ध बताता है। फलदीपिका 8.24
फलदीपिका 8.24 ग्यारहवें भाव (लाभ के भाव) में शनि को बहुत शुभ मानती है। ग्रंथ के अनुसार इससे लंबी आयु, स्थायी धन, अच्छी आय, साहस और निरोगी शरीर मिलता है। फलदीपिका 8.24
फलदीपिका 8.24 बारहवें भाव (व्यय और हानि के भाव) में शनि की स्थिति को कठिन मानती है। ग्रंथ निर्लज्जता, निर्धनता, संतान के अभाव, किसी अंग में दोष, मंद बुद्धि और शत्रुओं द्वारा निकाले जाने की बात कहता है। फलदीपिका 8.24