राहु महादशा के विषय
महत्वाकांक्षा, अनजानी चीज़ें और अचानक मोड़
राहु · चंद्र
राहु महादशा में चंद्र की अंतर्दशा 1 वर्ष 6 माह चलती है। यह नौ में से आठवीं अंतर्दशा है, और महादशा शुरू होने के 15 वर्ष 5 माह 12 दिन बाद आती है।
राहु के 18 वर्ष × चंद्र के 10 वर्ष ÷ 120
1 वर्ष 6 माह · 548 दिन
इससे पहले सूर्य की अंतर्दशा चलती है, और इसके बाद मंगल की।
राहु चंद्र को शत्रु मानते हैं, पर चंद्र राहु को सम (न मित्र, न शत्रु) मानते हैं। राहु–चंद्र की दशा पढ़ते समय शुरुआत इसी नैसर्गिक संबंध से होती है; यह दशा क्या लाएगी, यह इस पर निर्भर है कि आपकी कुंडली में राहु और चंद्र कहाँ बैठे हैं। राहु और केतु की मित्रता पर ग्रंथ एकमत नहीं हैं; यहाँ की कुंडली यही तालिका मानती है।
महत्वाकांक्षा, अनजानी चीज़ें और अचानक मोड़
मन, माँ और घर
राहु–चंद्र का असर, एक-एक क्षेत्र में, सीधे शब्दों में; नीचे दिए पराशर के श्लोकों से
| क्षेत्र | श्लोक क्या कहते हैं |
|---|---|
| काम और प्रतिष्ठा | शुभ हो तो: अधिकार मिलता है, सत्ता से सम्मान मिलता है और यश बढ़ता है। |
| धन और संपत्ति | शुभ हो तो: धन, वस्त्र, आभूषण, वाहन, घर-भूमि और धन-धान्य में वृद्धि होती है। |
| परिवार | शुभ हो तो: संतान से सुख मिलता है। |
| सेहत | शुभ हो तो: स्वास्थ्य अच्छा रहता है; कठिन हो तो: घर और खेत में भूत-प्रेत व जंगली जानवरों का उपद्रव, यात्रा में चोरों का भय और पेट के रोग होते हैं। |
| धर्म और यात्रा | शुभ हो तो: माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है और देव-पूजा होती है। |
बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 55, श्लोक 68–75
पराशर राहु महादशा में चंद्र की अंतर्दशा का फल चंद्र की स्थिति से बताते हैं: लग्न से और राहु से गिनकर, और चंद्र किन भावों के स्वामी हैं, इससे; आप पर कौन-सी बात लागू होती है, यह आपकी कुंडली बताती है, और ग्रंथ भले ही पुरुष जातक की बात करता हो, इसके फल हर किसी पर लागू होते हैं।
इन कष्टों से राहत के लिए बृहत् पाराशर होरा शास्त्र सफ़ेद गाय या भैंस का दान बताता है।
श्लोक 55.73–75एक सावधानी: जब चंद्र दूसरे भाव के, या जैसा यह श्लोक कहता है बारहवें भाव के स्वामी हों, तब बृहत् पाराशर होरा शास्त्र अकाल मृत्यु की आशंका की चेतावनी देता है। श्लोक 55.73–75
हर लग्न के लिए चंद्र क्या हैं, जैसा पराशर ने बताया है; राहु अपनी राशि के स्वामी के अनुसार फल देते हैं
तालिका के नाम, बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 से:
| लग्न | चंद्र (किन भावों के स्वामी) |
|---|---|
| मेष | तटस्थ चौथे भाव |
| वृषभ | अशुभ · मारक— केवल तीसरे भाव के स्वामी, दूसरे या सातवें के नहीं; फिर भी श्लोक 34.23–24 इन्हें मारक कहता है तीसरे भाव |
| मिथुन | मारक दूसरे भाव |
| कर्क | शुभ पहले भाव |
| सिंह | मारक— केवल बारहवें भाव के स्वामी, दूसरे या सातवें के नहीं; फिर भी श्लोक 34.29–30 इन्हें मारक कहता है बारहवें भाव |
| कन्या | अशुभ ग्यारहवें भाव |
| तुला | तटस्थ · योग— बुध के साथ योग देते हैं (34.34) दसवें भाव |
| वृश्चिक | योगकारक— श्लोक 34.35–36 के अनुसार, दशम भाव के स्वामी सूर्य के साथ नौवें भाव |
| धनु | तटस्थ आठवें भाव |
| मकर | अशुभ— सातवें भाव के स्वामी, पर श्लोक 34.39–40 इस लग्न के लिए मंगल को मारक कहता है सातवें भाव |
| कुंभ | अशुभ छठे भाव |
| मीन | शुभ पाँचवें भाव |
राहु किसी भाव के स्वामी नहीं, इसलिए कोई लग्न इन्हें अपने आप शुभ या अशुभ नहीं बनाता: ये जिस भाव में बैठें, उसका और उस राशि के स्वामी का फल देते हैं। कैसे, यह हर भाव में राहु वाले पेज पर देखें।
एक कुंडली जिसमें राहु–चंद्र 68 वर्ष की उम्र में आती है, उसी तरह पढ़ी हुई जैसे रिपोर्ट आपकी पढ़ती है
जन्म कुंडली रिपोर्ट से
राहु आपके चौथे भाव में बैठे हैं: यह काल उसके विषयों को आगे लाता है — घर, माँ, ज़मीन, वाहन और आराम। छाया ग्रह (राहु और केतु) अपनी राशि के स्वामी का फल देते हैं: यहाँ शनि, जो आपके चौथे और पाँचवें भाव के स्वामी हैं और तीसरे भाव में बैठे हैं। मिला-जुला — केंद्र या त्रिकोण, और कुछ नहीं: एक अनुकूल बात से दशा नहीं खुलती।
इस कुंडली में यह 26 अक्टूबर 2058 – 26 अप्रैल 2060 चलती है, 68 से 69 वर्ष की उम्र तक। यहाँ इसकी अवधि ऊपर बताई अवधि से एक दिन कम-ज़्यादा हो सकती है, क्योंकि हर कुंडली की तारीख़ें दिन तक पूरी की जाती हैं।
चंद्र: दसवें भाव के स्वामी, छठे भाव में। यह लाती है: काम, प्रतिष्ठा और अपने से बड़े अधिकारी। मिला-जुला — राहु से अच्छी स्थिति में और वर्गोत्तम; दूसरी तरफ़: कठिन भाव और षड्बल कम।
षड्बल: ग्रह के बल का छह तरह से किया गया माप, जो रिपोर्ट निकालती है; “षड्बल कम” का अर्थ है कि ग्रह का बल ग्रंथों की माँग से कम है। वर्गोत्तम: जन्म कुंडली और नवांश दोनों में एक ही राशि में, जिससे ग्रह बलवान होता है।
राहु–चंद्र नौ प्रत्यंतर दशाओं में बँटती है, चंद्र की अपनी से शुरू होकर। हर अवधि उसके साथ लिखी तारीख़ों के बीच गिनी गई है, और किसी भी कुंडली में एक-आध दिन के अंतर से यही रहती है; तारीख़ें और फल इसी कुंडली के हैं।
| प्रत्यंतर | अवधि | इस कुंडली में | रिपोर्ट का फल |
|---|---|---|---|
| चंद्र | 1 माह 15 दिन | 26 अक्टूबर 2058 – 11 दिसंबर 2058 | सावधानी |
| मंगल | 1 माह 1 दिन | 11 दिसंबर 2058 – 12 जनवरी 2059 | मिला-जुला |
| राहु | 2 माह 23 दिन | 12 जनवरी 2059 – 4 अप्रैल 2059 | खुलती है |
| गुरु | 2 माह 12 दिन | 4 अप्रैल 2059 – 16 जून 2059 | मिला-जुला |
| शनि | 2 माह 26 दिन | 16 जून 2059 – 11 सितंबर 2059 | खुलती है |
| बुध | 2 माह 16 दिन | 11 सितंबर 2059 – 27 नवंबर 2059 | मिला-जुला |
| केतु | 1 माह 2 दिन | 27 नवंबर 2059 – 29 दिसंबर 2059 | मिला-जुला |
| शुक्र | 3 माह | 29 दिसंबर 2059 – 29 मार्च 2060 | मिला-जुला |
| सूर्य | 28 दिन | 29 मार्च 2060 – 26 अप्रैल 2060 | खुलती है |
आपकी अपनी राहु–चंद्र की तारीख़ें दशा कैलकुलेटर मुफ़्त बताता है, और जन्म कुंडली रिपोर्ट आपकी अंतर्दशाएँ इसी तरह पढ़ती है, साथ में चल रही अंतर्दशा की प्रत्यंतर दशाएँ भी।
चंद्र के महीनों के लिए सुझाव; आपको इनकी कितनी ज़रूरत है, यह आपकी कुंडली बताएगी
पराशर राहु–चंद्र का अपना उपाय बताते हैं (श्लोक 55.73–75), जो ऊपर “पराशर का उपाय” में दिया है; पहले वही।
ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः
सोमवार को चावल और सफ़ेद वस्त्र का दान
चंद्र की किसी भी दशा में क्या करें और किससे बचें: चंद्र महादशा। इनके व्रत, रत्न, स्तोत्र और पूजा: चंद्र के उपाय।
1 वर्ष 6 माह (548 दिन): राहु के 18 वर्ष × चंद्र के 10 वर्ष ÷ 120। राहु महादशा शुरू होने के 15 वर्ष 5 माह 12 दिन बाद यह आती है।
पहले से नहीं कहा जा सकता: यह आपके लग्न पर और इस पर निर्भर है कि आपकी कुंडली में राहु और चंद्र कहाँ बैठे हैं। राहु किसी लग्न के लिए अपने आप शुभ या अशुभ नहीं होते; ये जिस राशि में बैठें, उसके स्वामी का फल देते हैं। चंद्र कर्क, वृश्चिक, मीन लग्न के लिए शुभ हैं। वृषभ, मिथुन, सिंह, कन्या, मकर, कुंभ लग्न के लिए चंद्र कठिन हैं। स्वभाव से इनकी मित्रता एक जैसी नहीं: राहु चंद्र को शत्रु मानते हैं, और चंद्र राहु को सम। ऊपर की तुला लग्न वाली कुंडली पर जन्म कुंडली रिपोर्ट इसे “मिला-जुला” पढ़ती है, जैसा ऊपर उसके चिह्न में लिखा है।
नौ, इस क्रम में: चंद्र, मंगल, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र, सूर्य। हर एक की अवधि = राहु–चंद्र की अवधि × प्रत्यंतर के ग्रह के वर्ष ÷ 120, इसलिए सबसे लंबी शुक्र की है, लगभग 3 माह, और सबसे छोटी सूर्य की, लगभग 28 दिन।
पराशर इस अंतर्दशा का अपना उपाय भी बताते हैं (श्लोक 55.73–75), जो ऊपर “पराशर का उपाय” में दिया है। चंद्र का बीज मंत्र ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः और सोमवार को चावल और सफ़ेद वस्त्र का दान राहु–चंद्र के रोज़ के उपाय हैं, जहाँ आपकी कुंडली इनकी ज़रूरत दिखाए।
यह जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र से निकलती है। जन्म विवरण भरें, और पूरी 120 वर्ष की समय-रेखा आ जाएगी, हर दशा का फल आपकी कुंडली के हिसाब से।
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