फलदीपिका 8.5 के अनुसार शुक्ल पक्ष के बढ़ते हुए चंद्र लग्न (पहले भाव) में हों तो शरीर दृढ़ और आयु लंबी होती है। ग्रंथ निर्भयता, बड़ा बल और धन भी बताता है। यदि लग्न में चंद्र कृष्ण पक्ष के घटते हुए चंद्र हों, तो फलदीपिका के अनुसार ये फल उलट जाते हैं। फलदीपिका 8.5
फलदीपिका 8.5 के अनुसार दूसरे भाव (धन और वाणी के भाव) में चंद्र हों तो जातक धनवान होता है, और या तो बड़ा विद्वान होता है या मधुर बोलने वाला। ग्रंथ भोग-विलास की रुचि और किसी अंग में दोष भी बताता है। फलदीपिका 8.5
फलदीपिका 8.5 के अनुसार तीसरे भाव (भाई-बहन और पराक्रम के भाव) में चंद्र हों तो भाई होते हैं और जातक बलवान और प्रभावशाली होता है। ग्रंथ प्रबल कामुकता और बहुत अधिक कंजूसी भी बताता है। फलदीपिका 8.5
फलदीपिका 8.6 के अनुसार चौथे भाव (घर, माता और सुख के भाव) में चंद्र हों तो जातक सुखी रहता है और जीवन के भोग भोगता है। ग्रंथ दानशीलता, मित्र, वाहन और यश भी बताता है। फलदीपिका 8.6
फलदीपिका 8.6 के अनुसार पाँचवें भाव (संतान और बुद्धि के भाव) में चंद्र हों तो अच्छी संतान और तीव्र बुद्धि मिलती है। ग्रंथ कहता है कि जातक मंत्री, यानी शासन के ऊँचे सलाहकार के पद तक पहुँचता है। फलदीपिका 8.6
फलदीपिका 8.6 के अनुसार छठे भाव (शत्रु और रोग के भाव) में चंद्र हों तो पेट के रोग, अपमान और विद्या की कमी रहती है। सावधानी के रूप में ग्रंथ अल्पायु की चेतावनी देता है। फलदीपिका 8.6
फलदीपिका 8.6 के अनुसार सातवें भाव (विवाह और साझेदारी के भाव) में चंद्र हों तो जातक देखने में मनोहर और अत्यंत आकर्षक होता है। ग्रंथ कहता है कि उसे सुंदर जीवनसाथी का प्रेम मिलता है। फलदीपिका 8.6
फलदीपिका 8.7 के अनुसार आठवें भाव (आयु और गुप्त विषयों के भाव) में चंद्र हों तो रोग घेरते हैं। ग्रंथ इसे अल्पायु के लक्षणों में भी गिनता है, और यह सावधानी के रूप में कहता है। फलदीपिका 8.7
फलदीपिका 8.7 के अनुसार नौवें भाव (भाग्य और धर्म के भाव) में चंद्र हों तो समृद्धि, पुण्य और संतान मिलते हैं। ग्रंथ विजय भी बताता है, और यह कि हर काम आरंभ से ही सफल होता है। फलदीपिका 8.7
फलदीपिका 8.7 के अनुसार दसवें भाव (कर्म के भाव) में चंद्र हों तो जातक सत्कर्म करता है। ग्रंथ कहता है कि वह सज्जनों की सहायता करता है। फलदीपिका 8.7
फलदीपिका 8.7 के अनुसार ग्यारहवें भाव (लाभ के भाव) में चंद्र हों तो जातक ऊँचे विचारों वाला और दीर्घायु होता है। ग्रंथ धन, संतान और सेवक भी बताता है। फलदीपिका 8.7
फलदीपिका 8.7 के अनुसार बारहवें भाव (व्यय और हानि के भाव) में चंद्र हों तो जातक दूसरों को अप्रिय लगता है, और उसे दुःख और अपमान सहना पड़ता है। ग्रंथ बहुत अधिक आलस्य भी बताता है। फलदीपिका 8.7