यहाँ पढ़ें कि बारहवें भाव में राहु लाल किताब और फलदीपिका के अनुसार क्या फल देते हैं, इसका उपाय क्या है, यहाँ से वे किन भावों को देखते हैं और हर लग्न के लिए इसका क्या मतलब है।
बारहवाँ भाव राहु का पक्का घर (वह भाव जिसे लाल किताब ग्रह का अपना घर मानती है, जहाँ वे सबसे स्थिर रहते हैं) है, फिर भी लाल किताब इसे दोनों तरह से पढ़ती है: कुंडली में बुध जैसे हों, राहु वैसा ही फल देते हैं। ये विदेश में बसना और छिपी ताक़त दे सकते हैं, पर कच्ची नींद और ख़र्च भी, अक्सर घर की स्त्रियों पर।
यहाँ राहु का बुध जैसा फल देना लाल किताब का केवल इसी भाव के लिए नियम है। आगे लिखी उक्ति कि राहु शनि की तरह फल देते हैं, पाराशरी परंपरा का सामान्य नियम है; दोनों को साथ रखकर पढ़ा जाता है।
लाल किताब बारहवें भाव में राहु को भाव से पढ़ती है, आपके लग्न से नहीं; आपके अपने लग्न के लिए पराशर का मत आगे है, और फलदीपिका का फल अलग हो सकता है। लाल किताब और पराशर में फ़र्क · लाल किताब: पक्का घर, ऋण और उपाय
खाना रसोई में बैठकर खाएँ। सिरहाने सौंफ और मिश्री रखें। चाँदी का ठोस हाथी रखें।
यह बारहवें भाव में राहु के लिए लाल किताब का एक उपाय है, इसके मिले-जुले फल को सँभालने के लिए; यह एक सुझाव है, और आपकी पूरी कुंडली कोई और उपाय भी माँग सकती है। राहु के सभी उपाय
फलदीपिका 8.27 बारहवें भाव (व्यय और हानि के भाव) में राहु को बहुत ख़र्च कराने वाला मानती है। ग्रंथ छिपकर पाप कर्म करने की प्रवृत्ति और जल से जुड़े रोगों की चेतावनी देता है।
इसमें से कितना फलेगा, यह बाक़ी कुंडली पर निर्भर है: राहु किस राशि में हैं, बारहवें भाव के स्वामी कहाँ हैं, और कौन-से ग्रह साथ हैं या इसे देखते हैं। पुराने ग्रंथ पुरुष जातक की बात करते हैं; उनके फल हर किसी पर लागू होते हैं।
बृहज्जातक राहु या केतु का भाव-फल नहीं देता: वराहमिहिर सूर्य से शनि तक सात ग्रह पढ़ते हैं।
इसका फल राहु की अपनी महादशा (18 साल) में और दूसरी महादशाओं के भीतर इनकी अंतर्दशा में सबसे ज़्यादा दिखता है। बारहवें भाव की बातें उस भाव के स्वामी की दशा में भी सामने आती हैं, जो आपके लग्न पर निर्भर है।
बारहवें भाव से इनकी दृष्टि (ग्रह की नज़र: ग्रह जिन भावों को देखते हैं, उन पर उनका असर पड़ता है), उन नियमों से जिनसे हमारी कुंडली भावों को तौलती है:
बारहवाँ भाव, व्यय भाव: ख़र्च, विदेश, नींद और मोक्ष; यह दुःस्थान भाव (छठा, आठवाँ और बारहवाँ भाव, रोग, अचानक घटनाओं और हानि के कठिन भाव) है; इसके कारक (वह ग्रह जो, लग्न कोई भी हो, भाव की बातों के स्वाभाविक सूचक होते हैं) शनि हैं। बारहवाँ भाव, और उसमें हर ग्रह
| लग्न | राहु की राशि | उस राशि के स्वामी | जो इस लग्न के लिए |
|---|---|---|---|
| मेष | मीन | गुरु | शुभ |
| वृषभ | मेष | मंगल | मारक |
| मिथुन | वृषभ | शुक्र | शुभ |
| कर्क | मिथुन | बुध | अशुभ |
| सिंह | कर्क | चंद्र | मारक— केवल बारहवें भाव के स्वामी, दूसरे या सातवें के नहीं; फिर भी श्लोक 34.29–30 इन्हें मारक कहता है |
| कन्या | सिंह | सूर्य | तटस्थ— साथ बैठे ग्रहों के अनुसार फल देते हैं (34.32) |
| तुला | कन्या | बुध | शुभ · योग— चंद्र के साथ योग देते हैं (34.34) |
| वृश्चिक | तुला | शुक्र | अशुभ · मारक |
| धनु | वृश्चिक | मंगल | शुभ |
| मकर | धनु | गुरु | अशुभ |
| कुंभ | मकर | शनि | शुभ— लग्नेश, जिन्हें श्लोक 34.41 स्वयं कुंभ के लिए शुभ बताता है |
| मीन | कुंभ | शनि | अशुभ · मारक— ग्यारहवें और बारहवें भाव के स्वामी, दूसरे या सातवें के नहीं; फिर भी श्लोक 34.43–44 इन्हें मारक कहता है |
राहु को किसी भाव का स्वामी नहीं माना जाता, इसलिए ये जिस राशि में बैठें, उसका और उस राशि के स्वामी का फल देते हैं। जिस लग्न के लिए उस राशि के स्वामी शुभ हों, उस लग्न में इस भाव में बैठे राहु भी शुभ फल की ओर झुकते हैं। पराशर भी यही कहते हैं: राहु मुख्य रूप से उस भाव का फल देते हैं जिसमें बैठे हों, और उस भाव-स्वामी का जिसके साथ हों (बृहत् पाराशर होरा शास्त्र 34.16); और केंद्र (कुंडली के चार कोने, यानी पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ भाव, जहाँ ग्रह सबसे ज़ोर से फल देते हैं) में बैठकर किसी केंद्र या त्रिकोण (पहला, पाँचवाँ और नौवाँ भाव, भाग्य के भाव) के स्वामी के साथ हों या उनकी दृष्टि पाएँ, तो योगकारक (वह ग्रह जो लग्न को योग, यानी सफलता और प्रतिष्ठा, देते हैं: लग्न के सबसे शुभ ग्रह) बन जाते हैं, यानी कुंडली को ऊपर उठाने वाले ग्रह (34.17)। परंपरा की उक्ति “शनिवत् राहु” भी है: राहु शनि की तरह फल देते हैं; फलदीपिका भी यही कहती है (8.34)। बाक़ी सातों ग्रह राहु और केतु के बीच हों, तो कुंडली में काल सर्प दोष देखा जाता है।
तालिका के नाम, बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 से:
यह ऊपर की जन्म-स्थिति नहीं: यहाँ राहु आपकी चंद्र राशि से गिनकर बारहवें भाव से गुज़र रहे हैं। फलदीपिका बारहवें भाव को राहु के गोचर के शुभ भावों में नहीं गिनती (बारहों भाव, राहु के पेज पर)। हमारी मासिक भविष्यवाणी इसे मिला-जुला पढ़ती है: विदेश से जुड़ाव, आध्यात्मिक उलझन, बदलाव पर ख़र्च।
लाल किताब इसे दोनों तरह से पढ़ती है, जहाँ शुभ और कठिन दोनों फल मिलते हैं; राहु तीसरे, छठे और दसवें भाव में अच्छा फल देते हैं। असल फल राशि और आपके लग्न पर निर्भर करता है।
लाल किताब इसके लिए यह उपाय देती है: खाना रसोई में बैठकर खाएँ; सिरहाने सौंफ और मिश्री रखें; चाँदी का ठोस हाथी रखें।
चौथे (माता), छठे (रोग) और आठवें (आयु) भाव को।
आपकी कुंडली में हर ग्रह कहाँ बैठे हैं, आपके लग्न के लिए किन भावों के स्वामी हैं और कौन-सी दशा चल रही है, इसी से तय होता है कि वे आपके लिए क्या करेंगे। सभी नौ ग्रह देखने के लिए अपनी मुफ़्त कुंडली बनाएँ।
मुफ़्त कुंडली बनाएँ

