यहाँ पढ़ें कि नौवें भाव में राहु लाल किताब और फलदीपिका के अनुसार क्या फल देते हैं, इसका उपाय क्या है, यहाँ से वे किन भावों को देखते हैं और हर लग्न के लिए इसका क्या मतलब है।
लाल किताब में नौवें भाव के राहु मिला-जुला फल देते हैं। ये आस्था, भाग्य और संतान के भाग्य को डगमगा सकते हैं, और भाई-बहनों से रिश्ते अच्छे रहें तभी अच्छा फल देते हैं; धर्म के अलग रास्तों और दूर की यात्राओं में रुचि आम है।
लाल किताब नौवें भाव में राहु को भाव से पढ़ती है, आपके लग्न से नहीं; आपके अपने लग्न के लिए पराशर का मत आगे है, और फलदीपिका का फल अलग हो सकता है। लाल किताब और पराशर में फ़र्क · लाल किताब: पक्का घर, ऋण और उपाय
केसर का तिलक लगाएँ। सोना पहनें। संतान के लिए कुत्ता पालें। ससुराल वालों से अच्छे रिश्ते रखें।
यह नौवें भाव में राहु के लिए लाल किताब का एक उपाय है, इसके मिले-जुले फल को सँभालने के लिए; यह एक सुझाव है, और आपकी पूरी कुंडली कोई और उपाय भी माँग सकती है। राहु के सभी उपाय
फलदीपिका 8.27 के अनुसार नौवें भाव (भाग्य और धर्म के भाव) में राहु हों तो जातक उलटी बात कहने वाला होता है। ग्रंथ उसे अपने कुल का मुखिया, गाँव का प्रधान या नगर का अध्यक्ष बताता है, पर साथ ही अधर्म के कामों की ओर झुका हुआ।
इसमें से कितना फलेगा, यह बाक़ी कुंडली पर निर्भर है: राहु किस राशि में हैं, नौवें भाव के स्वामी कहाँ हैं, और कौन-से ग्रह साथ हैं या इसे देखते हैं। पुराने ग्रंथ पुरुष जातक की बात करते हैं; उनके फल हर किसी पर लागू होते हैं।
बृहज्जातक राहु या केतु का भाव-फल नहीं देता: वराहमिहिर सूर्य से शनि तक सात ग्रह पढ़ते हैं।
इसका फल राहु की अपनी महादशा (18 साल) में और दूसरी महादशाओं के भीतर इनकी अंतर्दशा में सबसे ज़्यादा दिखता है। नौवें भाव की बातें उस भाव के स्वामी की दशा में भी सामने आती हैं, जो आपके लग्न पर निर्भर है।
नौवें भाव से इनकी दृष्टि (ग्रह की नज़र: ग्रह जिन भावों को देखते हैं, उन पर उनका असर पड़ता है), उन नियमों से जिनसे हमारी कुंडली भावों को तौलती है:
नौवाँ भाव, धर्म भाव: भाग्य, पिता, धर्म, गुरु और लंबी यात्राएँ; यह त्रिकोण भाव (पहला, पाँचवाँ और नौवाँ भाव, भाग्य के भाव) है; इसके कारक (वह ग्रह जो, लग्न कोई भी हो, भाव की बातों के स्वाभाविक सूचक होते हैं) गुरु, सूर्य हैं। नौवाँ भाव, और उसमें हर ग्रह
| लग्न | राहु की राशि | उस राशि के स्वामी | जो इस लग्न के लिए |
|---|---|---|---|
| मेष | धनु | गुरु | शुभ |
| वृषभ | मकर | शनि | योगकारक |
| मिथुन | कुंभ | शनि | तटस्थ |
| कर्क | मीन | गुरु | शुभ |
| सिंह | मेष | मंगल | योगकारक |
| कन्या | वृषभ | शुक्र | शुभ · मारक · योग— बुध के साथ योग देते हैं (34.32) |
| तुला | मिथुन | बुध | शुभ · योग— चंद्र के साथ योग देते हैं (34.34) |
| वृश्चिक | कर्क | चंद्र | योगकारक— श्लोक 34.35–36 के अनुसार, दशम भाव के स्वामी सूर्य के साथ |
| धनु | सिंह | सूर्य | शुभ · योग— बुध के साथ योग देते हैं (34.38) |
| मकर | कन्या | बुध | शुभ |
| कुंभ | तुला | शुक्र | योगकारक |
| मीन | वृश्चिक | मंगल | शुभ · योग— गुरु के साथ योग देते हैं (34.44)— साथ ही मारक भी कहे गए, पर अपने आप मारक नहीं (34.44) |
राहु को किसी भाव का स्वामी नहीं माना जाता, इसलिए ये जिस राशि में बैठें, उसका और उस राशि के स्वामी का फल देते हैं। जिस लग्न के लिए उस राशि के स्वामी शुभ हों, उस लग्न में इस भाव में बैठे राहु भी शुभ फल की ओर झुकते हैं। पराशर भी यही कहते हैं: राहु मुख्य रूप से उस भाव का फल देते हैं जिसमें बैठे हों, और उस भाव-स्वामी का जिसके साथ हों (बृहत् पाराशर होरा शास्त्र 34.16); और केंद्र (कुंडली के चार कोने, यानी पहला, चौथा, सातवाँ और दसवाँ भाव, जहाँ ग्रह सबसे ज़ोर से फल देते हैं) में बैठकर किसी केंद्र या त्रिकोण के स्वामी के साथ हों या उनकी दृष्टि पाएँ, तो योगकारक (वह ग्रह जो लग्न को योग, यानी सफलता और प्रतिष्ठा, देते हैं: लग्न के सबसे शुभ ग्रह) बन जाते हैं, यानी कुंडली को ऊपर उठाने वाले ग्रह (34.17)। परंपरा की उक्ति “शनिवत् राहु” भी है: राहु शनि की तरह फल देते हैं; फलदीपिका भी यही कहती है (8.34)। बाक़ी सातों ग्रह राहु और केतु के बीच हों, तो कुंडली में काल सर्प दोष देखा जाता है।
तालिका के नाम, बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 से:
यह ऊपर की जन्म-स्थिति नहीं: यहाँ राहु आपकी चंद्र राशि से गिनकर नौवें भाव से गुज़र रहे हैं। फलदीपिका नौवें भाव को राहु के गोचर के शुभ भावों में नहीं गिनती (बारहों भाव, राहु के पेज पर)। हमारी मासिक भविष्यवाणी इसे मिला-जुला पढ़ती है: अलग तरह की मान्यताएँ, दूर देश की आस्था, आध्यात्मिक खोज।
लाल किताब इसे दोनों तरह से पढ़ती है, जहाँ शुभ और कठिन दोनों फल मिलते हैं; राहु तीसरे, छठे और दसवें भाव में अच्छा फल देते हैं। असल फल राशि और आपके लग्न पर निर्भर करता है।
लाल किताब इसके लिए यह उपाय देती है: केसर का तिलक लगाएँ; सोना पहनें; संतान के लिए कुत्ता पालें; ससुराल वालों से अच्छे रिश्ते रखें।
पहले (आप ख़ुद), तीसरे (छोटे भाई-बहन) और पाँचवें (संतान) भाव को।
आपकी कुंडली में हर ग्रह कहाँ बैठे हैं, आपके लग्न के लिए किन भावों के स्वामी हैं और कौन-सी दशा चल रही है, इसी से तय होता है कि वे आपके लिए क्या करेंगे। सभी नौ ग्रह देखने के लिए अपनी मुफ़्त कुंडली बनाएँ।
मुफ़्त कुंडली बनाएँ

