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चक्र का 16.7%

शुक्र महादशा
20 वर्ष

शुक्र महादशा 20 वर्ष चलती है, और इससे इन बातों का विचार किया जाता है: विवाह, सुख-सुविधा और कला। आपके लिए इसका फल इस पर निर्भर करता है कि आपकी कुंडली में शुक्र कहाँ बैठे हैं।

शुक्र महादशा, 120 वर्ष के विंशोत्तरी दशा चक्र में बाक़ी आठ के साथशुक्र महादशा, 120 वर्ष के विंशोत्तरी दशा चक्र में बाक़ी आठ के साथ

चक्र में शुक्र महादशा

120 में से 20 वर्ष। यह केतु (7 वर्ष) के बाद और सूर्य (6 वर्ष) से पहले आती है। जन्म के समय चंद्रमा भरणी, पूर्वा फाल्गुनी या पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में थे, तो आप इसी महादशा में जन्मे; ये तीनों नक्षत्र शुक्र के हैं।

केतु7 वर्ष
शुक्र20 वर्ष
सूर्य6 वर्ष
चंद्र10 वर्ष
मंगल7 वर्ष
राहु18 वर्ष
गुरु16 वर्ष
शनि19 वर्ष
बुध17 वर्ष

नौ अंतर्दशाएँ

हर अंतर्दशा की अवधि = 20 × उस ग्रह के वर्ष ÷ 120। सबसे लंबी शुक्र–शुक्र, सबसे छोटी शुक्र–सूर्य; सब मिलकर 20 वर्ष।

  1. शुक्र–शुक्र3 वर्ष 4 माह · 1,218 दिन
  2. शुक्र–सूर्य1 वर्ष · 365 दिन
  3. शुक्र–चंद्र1 वर्ष 8 माह · 609 दिन
  4. शुक्र–मंगल1 वर्ष 2 माह · 426 दिन
  5. शुक्र–राहु3 वर्ष · 1,096 दिन
  6. शुक्र–गुरु2 वर्ष 8 माह · 974 दिन
  7. शुक्र–शनि3 वर्ष 2 माह · 1,157 दिन
  8. शुक्र–बुध2 वर्ष 10 माह · 1,035 दिन
  9. शुक्र–केतु1 वर्ष 2 माह · 426 दिन

यहाँ दशा का एक वर्ष 365.25 दिन का माना गया है, जो आजकल सबसे प्रचलित है। जो पंचांग 360 दिन का वर्ष लेते हैं, उनमें तारीख़ें थोड़ी अलग आएँगी। हर अवधि को निकटतम दिन तक पूरा किया गया है।

पराशर के अनुसार (बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 60)

हर पंक्ति ग्रंथ का फल है: अंतर्दशा के स्वामी अच्छी स्थिति में हों तो क्या, और न हों तो क्या। आप पर कौन-सा लागू होता है, यह आपकी कुंडली तय करती है।

शुक्र की अंतर्दशा

शुभ हो तो: पराशर के अनुसार इस अंतर्दशा में ब्राह्मणों के माध्यम से धन और पशुधन मिलता है, पुत्र जन्म के उत्सव होते हैं, सुख रहता है, सत्ता में बैठे लोगों से सम्मान मिलता है, और अधिकार या ऊँचा पद मिलता है।

कठिन हो तो: पराशर चोरों से भय, सरकारी अधिकारियों से विरोध, मित्रों और संबंधियों की हानि, और जीवनसाथी तथा संतान को कष्ट की चेतावनी देते हैं।

सावधानी: जब शुक्र आपकी कुंडली में दूसरे या सातवें भाव के स्वामी हों, तब बृहत् पाराशर होरा शास्त्र इस अवधि को मारक (जिसे शास्त्र प्राणों के संकट से जोड़ते हैं) मानता है।

उपाय: राहत के लिए बृहत् पाराशर होरा शास्त्र दुर्गा पाठ और गाय का दान बताता है।

श्लोक 60.1–11

सूर्य की अंतर्दशा

शुभ हो तो: पराशर के अनुसार इस अंतर्दशा में अधिकार और धन मिलता है, जीवनसाथी, संतान, अपने स्वामी या नियोक्ता और माता-पिता से सुख मिलता है, मित्रों से मिलना होता है, विवाह होता है, नाम और यश मिलता है, भाग्य में उन्नति होती है और पुत्र का जन्म होता है।

कठिन हो तो: पराशर पीड़ा, सत्ता की नाराज़गी, और पैतृक संपत्ति के साझेदारों से झगड़ों की चेतावनी देते हैं। अनुवादक को इस श्लोक के छपे रूप पर संदेह है, क्योंकि उनमें से कई राशियों में सूर्य शुभ फल भी देते हैं; इसलिए इसे अपनी कुंडली की बाक़ी बातों के साथ ही पढ़ें।

सावधानी: जब सूर्य आपकी कुंडली में दूसरे या सातवें भाव के स्वामी हों (ये मारक भाव हैं, जिन्हें शास्त्र प्राणों के संकट से जोड़ते हैं), तब बृहत् पाराशर होरा शास्त्र इस अवधि में ग्रहों के अशुभ प्रभाव की चेतावनी देता है और सावधानी बरतने को कहता है।

उपाय: राहत के लिए बृहत् पाराशर होरा शास्त्र सूर्य की उपासना बताता है।

श्लोक 60.12–20

चंद्र की अंतर्दशा

शुभ हो तो: पराशर के अनुसार इस अंतर्दशा में सत्ता की कृपा से धन, वाहन और वस्त्र मिलते हैं, परिवार में सुख रहता है, बड़ा वैभव और प्रतिष्ठा मिलती है, और देवताओं व ब्राह्मणों में भक्ति रहती है। साथ ही संगीतकारों और विद्वानों की संगति, सम्मान, गाय, भैंस और दूसरे पशुधन, और व्यापार में असाधारण लाभ मिलता है, और भाइयों के साथ भोजन का अवसर आता है।

कठिन हो तो: पराशर धन हानि, भय, शारीरिक कष्ट, पीड़ा, सत्ता की नाराज़गी, परदेस या तीर्थ की यात्राएँ, जीवनसाथी और संतान को कष्ट, और संबंधियों से बिछोह की चेतावनी देते हैं।

इन श्लोकों में इसके लिए अलग से कोई सावधानी या उपाय नहीं दिया गया; चंद्र के रोज़ के उपाय उनके पेज पर हैं।

श्लोक 60.21–29

मंगल की अंतर्दशा

शुभ हो तो: पराशर के अनुसार इस अंतर्दशा में अधिकार या ऊँचा पद मिलता है, और संपत्ति, वस्त्र, आभूषण, भूमि तथा मनचाही वस्तुएँ मिलती हैं।

कठिन हो तो: पराशर ठंड लगकर ज्वर, माता-पिता को ज्वर जैसे रोग, पद की हानि, झगड़े, सत्ता और सरकारी अधिकारियों से विरोध, और अधिक ख़र्च की चेतावनी देते हैं।

सावधानी: जब मंगल आपकी कुंडली में दूसरे या सातवें भाव के स्वामी हों (ये मारक भाव हैं, जिन्हें शास्त्र प्राणों के संकट से जोड़ते हैं), तब बृहत् पाराशर होरा शास्त्र शारीरिक कष्ट, अपने काम-धंधे में हानि और भूमि या संपत्ति की हानि की चेतावनी देता है और सावधानी बरतने को कहता है।

इन श्लोकों में इसके लिए अलग से कोई उपाय नहीं दिया गया; मंगल के रोज़ के उपाय उनके पेज पर हैं।

श्लोक 60.30–35

राहु की अंतर्दशा

शुभ हो तो: पराशर के अनुसार इस अंतर्दशा में बड़ा सुख और धन-लाभ होता है, मित्र आते हैं, यात्राएँ सफल होती हैं, और पशुधन व भूमि मिलती है।

कठिन हो तो: पराशर अपने और माता-पिता के लिए अशुभ फल, और लोगों से विरोध की चेतावनी देते हैं।

सावधानी: जब राहु आपके दूसरे या सातवें भाव में बैठे हों या इन भावों के स्वामियों के साथ हों (श्लोक उन्हें इन भावों का स्वामी कहता है; छाया ग्रह किसी भाव के स्वामी नहीं होते), तब बृहत् पाराशर होरा शास्त्र शारीरिक कष्ट की चेतावनी देता है और स्वास्थ्य का ध्यान रखने को कहता है।

उपाय: राहत के लिए बृहत् पाराशर होरा शास्त्र महामृत्युंजय जप (आरोग्य और दीर्घायु के लिए शिव का मंत्र) बताता है।

श्लोक 60.36–44

गुरु की अंतर्दशा

शुभ हो तो: पराशर के अनुसार इस अंतर्दशा में खोया हुआ पद या अधिकार लौटता है, मनचाहा अन्न, वस्त्र और संपत्ति मिलती है, मित्रों और सत्ता में बैठे लोगों से आदर मिलता है, धन-लाभ, सम्मान और अच्छी प्रतिष्ठा मिलती है, वाहन मिलते हैं, नियोक्ता और विद्वानों की संगति मिलती है, शास्त्रों के अध्ययन में लगन रहती है, पुत्र का जन्म होता है, मन संतुष्ट रहता है, घनिष्ठ मित्र आते हैं, और माता-पिता व पुत्र को सुख मिलता है।

कठिन हो तो: पराशर सत्ता और चोरों से भय, अपने और संबंधियों को कष्ट, झगड़े, मानसिक पीड़ा, पद की हानि, परदेस जाने, और कई तरह के रोगों के भय की चेतावनी देते हैं।

सावधानी: जब गुरु आपकी कुंडली में दूसरे या सातवें भाव के स्वामी हों (ये मारक भाव हैं, जिन्हें शास्त्र प्राणों के संकट से जोड़ते हैं), तब बृहत् पाराशर होरा शास्त्र शारीरिक कष्ट की चेतावनी देता है और स्वास्थ्य का ध्यान रखने को कहता है।

उपाय: राहत के लिए पराशर वही उपाय बताते हैं जो ऊपर राहु की अंतर्दशा के लिए है (श्लोक 60.51)।

श्लोक 60.45–51

शनि की अंतर्दशा

शुभ हो तो: पराशर के अनुसार इस अंतर्दशा में बड़ा सुख मिलता है, मित्र और संबंधी आते हैं, सत्ता में बैठे लोगों से सम्मान मिलता है, पुत्री का जन्म होता है, तीर्थों और पवित्र स्थलों की यात्रा होती है, और सत्ता की ओर से अधिकार मिलता है।

कठिन हो तो: पराशर आलस्य और आय से अधिक ख़र्च की चेतावनी देते हैं।

सावधानी: जब शनि आपकी कुंडली में दूसरे या सातवें भाव के स्वामी हों (ये मारक भाव हैं, जिन्हें शास्त्र प्राणों के संकट से जोड़ते हैं), तब बृहत् पाराशर होरा शास्त्र शारीरिक कष्ट की चेतावनी देता है और स्वास्थ्य का ध्यान रखने को कहता है।

उपाय: राहत के लिए बृहत् पाराशर होरा शास्त्र तिल से हवन, महामृत्युंजय जप, और दुर्गा सप्तशती का पाठ बताता है, जो स्वयं करें या किसी ब्राह्मण से करवाएँ।

श्लोक 60.52–59

बुध की अंतर्दशा

शुभ हो तो: पराशर के अनुसार इस अंतर्दशा में भाग्योदय होता है, पुत्र का जन्म होता है, अदालत के फ़ैसले से धन मिलता है, पुराण-कथाएँ सुनने को मिलती हैं, काव्य में निपुण लोगों की संगति मिलती है, घनिष्ठ मित्र आते हैं, अपने स्वामी या नियोक्ता से सुख मिलता है और मीठे पकवान मिलते हैं।

कठिन हो तो: पराशर पीड़ा, पशुधन की हानि, दूसरों के घर में रहने और व्यापार में हानि की चेतावनी देते हैं। वे आरंभ में कुछ शुभ फल, मध्य में सामान्य फल, और अंत में ज्वर आदि से कष्ट बताते हैं।

सावधानी: जब बुध आपकी कुंडली में दूसरे या सातवें भाव के स्वामी हों (ये मारक भाव हैं, जिन्हें शास्त्र प्राणों के संकट से जोड़ते हैं), तब बृहत् पाराशर होरा शास्त्र शारीरिक कष्ट की चेतावनी देता है और स्वास्थ्य का ध्यान रखने को कहता है।

उपाय: राहत के लिए बृहत् पाराशर होरा शास्त्र विष्णु सहस्रनाम का पाठ बताता है।

श्लोक 60.60–66

केतु की अंतर्दशा

शुभ हो तो: पराशर के अनुसार अंतर्दशा के बिल्कुल आरंभ से मीठे पकवान मिलते हैं, काम-धंधे में असाधारण लाभ होता है और पशुधन बढ़ता है। मध्य में सामान्य फल रहते हैं और कभी-कभी कष्ट भी होता है, और अंत में शत्रुओं पर निश्चित विजय मिलती है।

कठिन हो तो: पराशर साँप, चोर और घाव से भय, सोचने-समझने की शक्ति में कमी, सिरदर्द, पीड़ा, बिना कारण के झगड़े, मधुमेह, अधिक ख़र्च, जीवनसाथी और संतान से विरोध, परदेस जाने और कामों में हानि की चेतावनी देते हैं।

सावधानी: जब केतु आपके दूसरे या सातवें भाव में बैठे हों या इन भावों के स्वामियों के साथ हों (श्लोक उन्हें इन भावों का स्वामी कहता है; छाया ग्रह किसी भाव के स्वामी नहीं होते), तब बृहत् पाराशर होरा शास्त्र शारीरिक कष्ट की चेतावनी देता है और स्वास्थ्य का ध्यान रखने को कहता है।

उपाय: राहत के लिए बृहत् पाराशर होरा शास्त्र महामृत्युंजय जप (आरोग्य और दीर्घायु के लिए शिव का मंत्र) और बकरी का दान बताता है। शास्त्र यह भी कहता है कि शुक्र को प्रसन्न करने के उपाय भी लाभ देते हैं।

श्लोक 60.67–74

शुक्र महादशा से किन बातों का विचार होता है

शास्त्र क्या कहते हैं, और आपकी कुंडली में इसका फल किससे तय होता है।

किन बातों का विचार

विवाह, सुख-सुविधा और कला

आपकी कुंडली तय करती है

आपकी कुंडली में शुक्र किन भावों के स्वामी हैं, किस भाव में बैठे हैं और वहाँ कितने बलवान हैं। शुक्र केंद्र (पहले, चौथे, सातवें, दसवें भाव) या त्रिकोण (पहले, पाँचवें, नौवें भाव) में, अपनी राशि में बलवान हों तो दशा अच्छा फल देती है; छठे, आठवें या बारहवें भाव में हों तो सावधानी रखनी पड़ती है। देखें: हर भाव में शुक्र और इनके उपाय।

आपकी कुंडली के हिसाब से

दशा कैलकुलेटर बताता है कि शुक्र महादशा आपके जीवन में कब आएगी, और आपकी कुंडली के हिसाब से इसका और इसकी हर अंतर्दशा का फल बताता है। मेरी दशा देखें।

पराशर इस महादशा के बारे में क्या कहते हैं (श्लोक 47.78–89)

पराशर के बताए फल शर्तों के साथ हैं: आपकी कुंडली में दशा के स्वामी कहाँ बैठे हैं, और किनके साथ हैं। पुराना ग्रंथ पुरुष जातक की बात करता है, पर इसके फल हर किसी पर लागू होते हैं।

जब यह शुभ फल देती है

  • शुक्र उच्च राशि या स्वराशि में हों, अथवा केंद्र (पहले, चौथे, सातवें या दसवें भाव) या त्रिकोण (पहले, पाँचवें या नौवें भाव) में हों, तो पराशर लक्ष्मी जी की कृपा से सुंदर वस्त्र, आभूषण, वाहन, पशुधन और भूमि, प्रतिदिन मीठे पकवान, शासन से सम्मान, और गीत-संगीत व नृत्य के उत्सव बताते हैं।श्लोक 47.79–82
  • शुक्र मूलत्रिकोण (विशेष बल वाली मूल राशि) में हों, तो पराशर उनकी दशा में निश्चय ही अधिकार की प्राप्ति, घर, संतान और पौत्रों का जन्म, परिवार में विवाह, सेनापति जैसा ऊँचा पद, मित्रों का आना, और खोए धन, संपत्ति या पद की वापसी बताते हैं।श्लोक 47.79–82
  • शुक्र नौवें या दसवें भाव के स्वामी होकर चौथे भाव में हों, तो पराशर किसी क्षेत्र या गाँव पर अधिकार; जलाशय और मंदिर बनवाने व अन्नदान जैसे पुण्य कार्य; प्रतिदिन मीठे पकवान; काम में उत्साह; नाम और यश; और जीवनसाथी व संतान से सुख बताते हैं। वे यह भी कहते हैं कि शुक्र की अंतर्दशाओं में भी ऐसे ही फल मिलते हैं।श्लोक 47.85–88

जब यह कठिन होती है

  • शुक्र छठे, आठवें या बारहवें भाव में हों, तो पराशर परिवार वालों से वैर, जीवनसाथी को कष्ट, व्यापार में हानि, पशुधन की हानि और संबंधियों से बिछोह की चेतावनी देते हैं।श्लोक 47.83–84½
  • शुक्र दूसरे या सातवें भाव के स्वामी हों, तो पराशर उनकी दशा में शारीरिक पीड़ा और कष्ट की चेतावनी देते हैं।श्लोक 47.88–89

पराशर का उपाय

इन कष्टों से राहत के लिए पराशर विधि-पूर्वक शतरुद्रीय या मृत्युंजय जप करने, और गाय या भैंस का दान करने को कहते हैं।

श्लोक 47.89

शुक्र महादशा में उपाय

शुक्र की दशा में परंपरा के सुझाव; आपको इनकी कितनी ज़रूरत है, यह आपकी कुंडली बताएगी।

क्या करें

  • शुक्रवार को माँ लक्ष्मी की पूजा करें
  • अपने आसपास साफ़-सफ़ाई और सुंदरता बनाए रखें
  • ग़रीब महिलाओं को सफ़ेद चीज़ें दान करें
  • कला का अभ्यास करें: संगीत, नृत्य या चित्रकारी
  • जीवनसाथी और महिलाओं का आदर करें

किन बातों से बचें

  • भोग-विलास में ज़रूरत से ज़्यादा डूबने से बचें
  • महिलाओं का अनादर न करें
  • फ़िज़ूलख़र्ची से बचें

बीज मंत्र और दान

बीज मंत्र शुक्र की मूल ध्वनि है, जिसे गिनकर जपा जाता है।

ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः

शुक्रवार को सफ़ेद वस्त्र और चावल का दान करें

शुक्र के सभी उपाय

हर लग्न के लिए शुक्र महादशा

पराशर आपके लग्न के लिए शुक्र को शुभ गिनते हैं या कठिन, इसी से इस दशा का स्वर तय होता है।

लग्नशुक्र (किन भावों के स्वामी)
मेषअशुभ · मारक
दूसरे और सातवें भाव
वृषभअशुभ · मारक— लग्नेश, पर छठे भाव के स्वामी भी: अशुभ और मारक (34.23–24)
पहले और छठे भाव
मिथुनशुभ
पाँचवें और बारहवें भाव
कर्कअशुभ
चौथे और ग्यारहवें भाव
सिंहअशुभ
तीसरे और दसवें भाव
कन्याशुभ · मारक · योग— बुध के साथ योग देते हैं (34.32)
दूसरे और नौवें भाव
तुलातटस्थ— लग्नेश, जिन्हें श्लोक 34.34 तटस्थ कहता है
पहले और आठवें भाव
वृश्चिकअशुभ · मारक
सातवें और बारहवें भाव
धनुअशुभ · मारक— छठे और ग्यारहवें भाव के स्वामी, दूसरे या सातवें के नहीं; फिर भी श्लोक 34.37–38 इन्हें मारक कहता है
छठे और ग्यारहवें भाव
मकरयोगकारक
पाँचवें और दसवें भाव
कुंभयोगकारक
चौथे और नौवें भाव
मीनअशुभ
तीसरे और आठवें भाव

तालिका के नाम, बृहत् पाराशर होरा शास्त्र, अध्याय 34 से:

  • योगकारक: लग्न के सबसे शुभ ग्रह: जिन्हें पराशर योग देने वाले बताते हैं, या जो एक साथ केंद्र (पहले, चौथे, सातवें, दसवें) और त्रिकोण (पहले, पाँचवें, नौवें) भाव के स्वामी हों (34.13)
  • शुभ, अशुभ, तटस्थ: लग्न के पक्ष में; कठिन बातें लाने वाले; दोनों में से कोई नहीं
  • लग्नेश: लग्न के अपने स्वामी, जहाँ श्लोक इन्हें शुभ या अशुभ नहीं कहता
  • मारक: जिन्हें पराशर उस लग्न के लिए आयु और सेहत पर भारी बताते हैं; अकेले, या किसी और नाम के बाद लिखे जाते हैं। ये हमेशा दूसरे या सातवें भाव के स्वामी नहीं होते: जहाँ अलग हों, नीचे की पंक्ति श्लोक बताती है
  • · योग: उन दो ग्रहों में से एक जो इस लग्न के लिए साथ मिलकर योग देते हैं
मेरी चल रही दशा का मेरे लिए क्या मतलब है?आचार्य पराशर आपकी पूरी कुंडली देखकर आपकी महादशा और अंतर्दशा का फल बताते हैं।

आम सवाल

शुक्र महादशा कितने समय चलती है?

20 वर्ष, यानी 120 वर्ष के चक्र का 16.7%, और यह नौ अंतर्दशाओं में बँटी होती है।

शुक्र महादशा कब शुरू होती है?

अगर जन्म के समय चंद्रमा भरणी, पूर्वा फाल्गुनी या पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में थे, तो जन्म से ही; नहीं तो केतु महादशा ख़त्म होने पर। यह आपके जीवन में आएगी या नहीं, यह इस पर निर्भर है कि जन्म के समय कौन-सी महादशा चल रही थी।

शुक्र महादशा अच्छी है या बुरी?

आम तौर पर दोनों में से कोई नहीं। यह इस बात से तय होता है कि आपकी कुंडली में शुक्र किन भावों के स्वामी हैं, कहाँ बैठे हैं और कितने बलवान हैं; कैलकुलेटर इसे आपकी कुंडली के हिसाब से पढ़ता है।

आपकी कौन-सी दशा चल रही है, यह आपकी कुंडली का तथ्य है।

यह जन्म के समय चंद्रमा के नक्षत्र से निकलती है। जन्म विवरण भरें, और पूरी 120 वर्ष की समय-रेखा आ जाएगी, हर दशा का फल आपकी कुंडली के हिसाब से।

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9 विस्तृत रिपोर्ट, जिनमें जन्म कुंडली, कुंडली मिलान और वार्षिक भविष्यवाणी हैं।हिंदी, अंग्रेज़ी और हिंग्लिशरिपोर्ट देखें
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