
जन्म कुंडली
Janam Kundliआपकी पूरी कुंडली का फल: हर ग्रह, हर भाव और हर योग, दशाएँ तारीख़ों के साथ, और आपके लिए उपाय।
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शनि अभी मीन में हैं
ढैय्या (‘ढाई’ शब्द से), यानी छोटी पनौती, चंद्र राशि से चौथे (कंटक शनि, यानी काँटा) या आठवें (अष्टम शनि) भाव में शनि का गोचर है। हर एक लगभग ढाई साल की होती है, पर शनि राशि की सीमा पर वक्री (उल्टी चाल में) होकर लौटते हैं, इसलिए यह लगभग 2 साल से 3 साल 8 महीने तक चल सकती है। अभी ढैय्या सिंह राशि (अष्टम शनि, 23 फ़रवरी 2028 तक) और धनु राशि (कंटक शनि, 23 फ़रवरी 2028 तक) पर चल रही है। 3 जून 2027 से 19 अक्टूबर 2027 तक, जब शनि मेष में रहेंगे, दोनों पर ढैय्या नहीं रहेगी; उन महीनों में ढैय्या मकर और कन्या राशि पर रहेगी।
जो ढैय्या अभी चल रही है, उसकी तारीख़ें; जो नहीं चल रही, उसकी अगली तारीख़ें। हर राशि के पेज पर सारी तारीख़ें हैं।
| राशि | कंटक शनि (चौथा) | अष्टम शनि (आठवाँ) |
|---|---|---|
| मेष | 13 जुलाई 2034 से 27 अगस्त 2036 तक | 11 दिसंबर 2043 से 8 दिसंबर 2046 तक |
| वृषभ | 27 अगस्त 2036 से 13 जुलाई 2039 तक | 8 दिसंबर 2046 से 4 दिसंबर 2049 तक |
| मिथुन | 22 अक्टूबर 2038 से 26 सितंबर 2041 तक | 6 मार्च 2049 से 25 फ़रवरी 2052 तक |
| कर्क | 28 जनवरी 2041 से 30 अगस्त 2044 तक (पहली बार शनि सिर्फ़ 9 दिन तुला में रहेंगे) | 25 फ़रवरी 2052 से 5 फ़रवरी 2055 तक |
| सिंह | 11 दिसंबर 2043 से 8 दिसंबर 2046 तक | 29 मार्च 2025 से 23 फ़रवरी 2028 तक (अभी) |
| कन्या | 8 दिसंबर 2046 से 4 दिसंबर 2049 तक | 3 जून 2027 से 17 अप्रैल 2030 तक |
| तुला | 6 मार्च 2049 से 25 फ़रवरी 2052 तक | 8 अगस्त 2029 से 31 मई 2032 तक |
| वृश्चिक | 25 फ़रवरी 2052 से 5 फ़रवरी 2055 तक | 31 मई 2032 से 13 जुलाई 2034 तक |
| धनु | 29 मार्च 2025 से 23 फ़रवरी 2028 तक (अभी) | 13 जुलाई 2034 से 27 अगस्त 2036 तक |
| मकर | 3 जून 2027 से 17 अप्रैल 2030 तक | 27 अगस्त 2036 से 13 जुलाई 2039 तक |
| कुंभ | 8 अगस्त 2029 से 31 मई 2032 तक | 22 अक्टूबर 2038 से 26 सितंबर 2041 तक |
| मीन | 31 मई 2032 से 13 जुलाई 2034 तक | 28 जनवरी 2041 से 30 अगस्त 2044 तक (पहली बार शनि सिर्फ़ 9 दिन तुला में रहेंगे) |
दो गोचर, दोनों का फल अलग-अलग, जैसा मंत्रेश्वर के ज्योतिष ग्रंथ फलदीपिका में है।
चंद्र राशि से चौथा भाव घर, माँ, वाहन, ज़मीन-जायदाद और मन की शांति का है; वहाँ से शनि की दृष्टि (नज़र) छठे, दसवें और पहले भाव पर पड़ती है।
फलदीपिका गोचर का फल जन्म के चंद्र से देखती है और मानती है कि शनि चंद्र से केवल तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में शुभ फल देते हैं; चौथा भाव इनमें नहीं है। चंद्र से चौथे भाव में शनि के गोचर के लिए ग्रंथ जीवनसाथी, संबंधियों और धन की हानि की चेतावनी देता है। फलदीपिका 26.2, 26.22
चंद्र राशि से आठवाँ भाव सेहत, अचानक की घटनाएँ, छिपी बातें और ससुराल का है; वहाँ से शनि की दृष्टि (नज़र) दसवें, दूसरे और पाँचवें भाव पर पड़ती है।
चंद्र से आठवें भाव में शनि के लिए ग्रंथ संतान, मित्रों, पशुधन और धन की हानि तथा रोग की चेतावनी देता है; श्लोक 26.33 आठवें भाव को, बारहवें और पहले के साथ, उन भावों में रखता है जहाँ शनि के गोचर में प्राण-संकट, पद से गिरने और धन-हानि की चेतावनी है। ये ग्रंथ की सावधानियाँ हैं, किसी व्यक्ति का निश्चित फल नहीं। फलदीपिका 26.22, 26.33
शनि हर राशि में लगभग ढाई साल रहते हैं और एक चक्कर लगभग साढ़े उनतीस साल में पूरा करते हैं। चंद्र राशि से वे पहले चौथे भाव (कंटक) में आते हैं, लगभग दस साल बाद आठवें (अष्टम) में, और उसके लगभग दस साल बाद बारहवें में, जहाँ से साढ़े साती शुरू होती है। दूसरे भाव से निकलते ही साढ़े साती ख़त्म होती है; फिर शनि तीसरे भाव से गुज़रते हैं और लगभग ढाई साल बाद फिर चौथे में आते हैं।
ग़लत राशि। ढैय्या चंद्र राशि से गिनी जाती है, उस सूर्य राशि से नहीं जो ज़्यादातर लोग जानते हैं। अपनी चंद्र राशि जानें।
निरयन, सायन नहीं। ये तारीख़ें निरयन (नक्षत्रों पर आधारित) राशिचक्र से हैं, सायन (ऋतुओं पर आधारित पश्चिमी राशिचक्र) से नहीं, और लाहिड़ी अयनांश (दोनों के बीच का अंतर) से, जो भारत सरकार का मानक है।
शुरू और ख़त्म होने की दो-दो तारीख़ें। शनि किसी राशि में कुछ दिन रहकर निकल जाएँ, या वक्री (उल्टी चाल में) होकर छोड़ी हुई राशि में लौटें, तो कुछ साइटें ढैय्या को दूसरे प्रवेश से शुरू या पहले निकास पर ख़त्म मान लेती हैं। यहाँ पहले प्रवेश से आख़िरी निकास तक की अवधि है, और पहली बार सिर्फ़ कुछ दिन रहें तो यह भी बताया गया है।
ढैय्या के वे उपाय जो घरों में पीढ़ियों से किए जाते हैं। मुफ़्त, और हर एक की वजह के साथ।
शनि मंत्र · शनिवार को 108 बार
ॐ शं शनैश्चराय नमः
शनि का छोटा मंत्र, उनके बीज अक्षर “शं” पर बना। हर हफ़्ते बिना नागा इसका जाप करना अपने-आप में वही अनुशासन है जो शनि माँगते हैं।
नीलम ढैय्या का आम उपाय नहीं है। यह कुछ कुंडलियों के लिए शुभ है और कुछ के लिए हानिकारक, इसलिए अपनी कुंडली दिखाकर ही पहनें।
यह कैसी जाएगी, यह आपकी अपनी कुंडली तय करती है।
अपनी कुंडली के लिए पढ़ें

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उदाहरण के लिए साइट की नमूना कुंडली लें: जन्म 15 जुलाई 1990, दोपहर 2:30 बजे, मुंबई। चंद्र मीन में हैं, इसलिए इस कुंडली की अगली ढैय्या कंटक शनि है, शनि मिथुन में, 31 मई 2032 से 13 जुलाई 2034 तक, यानी वही तारीख़ें जो हर मीन राशि वाले की हैं। फ़र्क़ इन चार बातों से आता है।
किसी दूसरे मीन राशि वाले की तारीख़ें यही होंगी, पर बाक़ी बातें शायद ही मिलें। इसीलिए तारीख़ें राशि के हर व्यक्ति के लिए एक-सी हैं, पर वे क्या लाती हैं, यह एक-सा नहीं।
एक समय में दो राशियों पर ढैय्या रहती है: जिसके चौथे भाव में शनि हैं, और जिसके आठवें में। जब शनि अगली राशि में कुछ महीने रहकर लौटते हैं, तो उतने समय ढैय्या अगली दो राशियों पर चली जाती है और फिर लौट आती है।
इस हिस्से में और: साढ़े साती · दोष क्या है
चंद्र राशि से चौथे या आठवें भाव में शनि का गोचर, हर एक लगभग ढाई साल: कंटक शनि और अष्टम शनि। इसे छोटी पनौती भी कहते हैं, और साढ़े साती को बड़ी।
शनि मीन में हैं; सिंह पर अष्टम शनि 23 फ़रवरी 2028 तक; धनु पर कंटक शनि 23 फ़रवरी 2028 तक।
लगभग ढाई साल, जितना शनि एक राशि में रहते हैं। शनि राशि छोड़कर फिर लौटें और उसके बाद आगे बढ़ें, तो पहले प्रवेश से आख़िरी निकास तक यह लगभग 3 साल 8 महीने तक खिंच सकती है।
आम तौर पर नहीं। परंपरा साढ़े साती को, जो लगभग साढ़े सात साल चलती है (शनि जितने समय चंद्र राशि से बारहवें, पहले और दूसरे भाव से गुज़रते हैं), लंबी और भारी मानती है; ढैय्या छोटी है और कम बातों पर असर डालती है, हालाँकि दक्षिण भारत में अष्टम शनि को लगभग उतना ही भारी माना जाता है। दोनों आपकी अपनी कुंडली से देखी जाती हैं।
ढैय्या क्या लाएगी, यह आपकी पूरी कुंडली से पढ़ा जाता है: आपका लग्न, आपकी दशा और शनि कहाँ बैठे हैं।
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