
जन्म कुंडली
Janam Kundliआपकी पूरी कुंडली का फल: हर ग्रह, हर भाव और हर योग, दशाएँ तारीख़ों के साथ, और आपके लिए उपाय।
46 पन्नेहिंदी · अंग्रेज़ी · हिंग्लिश
अभी ढैय्या नहीं चल रही · अगली 2041 में शुरू होगी
ढैय्या, जिसे छोटी पनौती भी कहते हैं, तब होती है जब शनि आपकी चंद्र राशि से चौथे (कंटक शनि) या आठवें (अष्टम शनि) भाव से गुज़रते हैं; ग्रह का किसी राशि से होकर गुज़रना गोचर कहलाता है। नाम ‘ढाई’ से बना है, क्योंकि हर एक लगभग ढाई साल चलती है; शनि वक्री होकर सीमा पार लौटें तो यह और लंबी खिंचती है। कर्क राशि पर ढैय्या तब होती है जब शनि तुला या कुंभ में हों। शनि अभी मीन में हैं, कर्क से नौवें भाव में, इसलिए कोई ढैय्या नहीं चल रही। कर्क राशि की साढ़े साती 31 मई 2032 से शुरू होगी, बीच में 22 अक्टूबर 2038 से 4 अप्रैल 2039 तक विराम रहेगा। कर्क राशि की दोनों ढैय्याएँ उन राशियों, तुला और कुंभ, में पड़ती हैं जहाँ शनि सहज रहते हैं, इसलिए ये शत्रु राशि वाली ढैय्या से हल्की रहती हैं।
14 साल 3 महीने बाद शुरू होगी · 28 जनवरी 2041
कंटक यानी काँटा, अष्टम यानी आठवाँ। दोनों की तारीख़ें अलग हैं, और जब शनि कुछ महीनों के लिए राशि छोड़कर लौटते हैं, तो अवधि पहले प्रवेश से आख़िरी निकास तक गिनी जाती है।
कंटक शनि
शनि तुला में, आपकी चंद्र राशि से चौथे भाव में
अगली · 28 जनवरी 2041 से 30 अगस्त 2044 तक
लगभग 3 साल 7 महीने। शनि 28 जनवरी 2041 को तुला में आएँगे और 30 अगस्त 2044 को तुला को आख़िरी बार छोड़ेंगे। बीच में वे 6 फ़रवरी 2041 से 25 सितंबर 2041 तक वापस कन्या में जाएँगे (तब ढैय्या थमी रहेगी) और 11 दिसंबर 2043 से 22 जून 2044 तक आगे वृश्चिक में जाएँगे (तब ढैय्या थमी रहेगी)। पहली बार शनि तुला में सिर्फ़ 9 दिन रहेंगे। शास्त्रीय नियम (फलदीपिका 26.25) के अनुसार इसका सबसे भारी हिस्सा तब है जब शनि तुला के आख़िरी तिहाई हिस्से (20° से 30°) में हों: 16 दिसंबर 2042 से 16 मई 2043 तक, 12 सितंबर 2043 से 11 दिसंबर 2043 तक और 23 जून 2044 से 30 अगस्त 2044 तक।
पिछली बार: 15 नवंबर 2011 से 2 नवंबर 2014 तक।
अष्टम शनि
शनि कुंभ में, आपकी चंद्र राशि से आठवें भाव में
उसके बाद · 25 फ़रवरी 2052 से 5 फ़रवरी 2055 तक
लगभग 2 साल 11 महीने। शनि 25 फ़रवरी 2052 को कुंभ में आएँगे और 5 फ़रवरी 2055 को कुंभ को आख़िरी बार छोड़ेंगे। बीच में वे 14 मई 2054 से 1 सितंबर 2054 तक आगे मीन में जाएँगे (तब ढैय्या थमी रहेगी)। शास्त्रीय नियम (फलदीपिका 26.25) के अनुसार इसका सबसे भारी हिस्सा तब है जब शनि कुंभ के आख़िरी तिहाई हिस्से (20° से 30°) में हों: 14 फ़रवरी 2054 से 14 मई 2054 तक और 2 सितंबर 2054 से 5 फ़रवरी 2055 तक।
पिछली बार: 29 अप्रैल 2022 से 29 मार्च 2025 तक।
ढैय्या का असर चार बातों से तय होता है: आपकी चंद्र राशि से गिनकर शनि किन भावों के स्वामी हैं, किस भाव में बैठे हैं, किन तीन भावों पर उनकी दृष्टि (नज़र) पड़ती है, और उस राशि में वे कितने सहज हैं, उच्च (सबसे बली) से नीच (सबसे निर्बल) तक। नियम मंत्रेश्वर के ज्योतिष ग्रंथ फलदीपिका के हैं।
शनि उच्च के: सबसे न्यायप्रिय
कर्क राशि के लिए शनि सातवें भाव (विवाह और साझेदारी) और आठवें भाव (अचानक घटनाएँ, ससुराल और पैतृक संपत्ति) के स्वामी हैं। कर्क से चौथा भाव तुला है, और शनि वहाँ आएँ तो दांपत्य, जीवनसाथी का परिवार और पैतृक संपत्ति, तीनों घर के भीतर आ जाते हैं। तुला में शनि की यह ढैय्या कंटक शनि कहलाती है, और इसका संबंध घर, माता, वाहन, भूमि-भवन और मन की शांति से है। तुला शनि की उच्च राशि है, और फलदीपिका (26.31) कहती है कि उच्च के शनि कठिन भाव में भी हानि नहीं करते। इसलिए चौथे भाव के शनि के लिए फलदीपिका 26.22 में दी गई जीवनसाथी, संबंधियों और धन से जुड़ी हानि की चेतावनी कर्क राशि वालों पर लागू नहीं होती। शनि की धीमी और स्थिर चाल फिर भी रहती है; नीचे के बिंदु बताते हैं कि वह कहाँ महसूस हो सकती है।
तुला से शनि की दृष्टि धनु, मेष और कर्क पर भी पड़ती है, यानी छठे भाव (दबाव वाला काम, विरोधी, क़र्ज़ और बीमारी), दसवें भाव (काम-काज, पद और बड़ों से व्यवहार) और पहले भाव (अपनी सेहत, आत्मविश्वास और दूसरों की नज़र में आपकी छवि) पर।
क्या करें घर से जुड़े निर्णय जीवनसाथी के साथ मिलकर लें, और यदि ससुराल वाले साथ रहने आएँ या संपत्ति बाँटनी हो, तो शर्तें प्रेम से और साफ़-साफ़ तय कर लें।
शनि अपनी राशि में: स्थिर
कर्क राशि से आठवाँ भाव कुंभ है, और शनि आपके सातवें भाव (विवाह और साझेदारी) और इसी आठवें भाव के स्वामी हैं। इसलिए कुंभ में आकर वे अपने ही भाव में बैठते हैं। यही अष्टम शनि की ढैय्या है, जिसका संबंध स्वास्थ्य, अचानक होने वाली घटनाओं, छिपी बातों, ससुराल और पैतृक संपत्ति से है। यहाँ शनि दांपत्य और साझेदारी की बातें आठवें भाव में ले आते हैं। कुंभ शनि की अपनी राशि है, और फलदीपिका 26.31 के अनुसार अपनी राशि में शनि हानि नहीं करते। पर आठवाँ भाव शनि की सबसे कड़ी चेतावनी वाले भावों में है (फलदीपिका 26.33)। इसलिए आठवें भाव के शनि के लिए फलदीपिका 26.22 में दी गई संतान, मित्रों और धन से जुड़ी हानि तथा रोग की चेतावनी बहुत हल्की है, पर बेअसर नहीं।
कुंभ से शनि की दृष्टि मेष, सिंह और वृश्चिक पर भी पड़ती है, यानी दसवें भाव (काम-काज, पद और बड़ों से व्यवहार), दूसरे भाव (परिवार, जमा-पूँजी और बोलचाल) और पाँचवें भाव (संतान, पढ़ाई और समझ-बूझ) पर।
फलदीपिका 26.22 एक ही श्लोक है जो चंद्र से पहले आठ भावों में से हर एक के शनि का फल बताता है, इसीलिए दोनों ढैय्या में उसी का हवाला है।
क्या करें व्यापार में कोई साझेदारी हो तो उसकी शर्तें लिखित में रखें, और अपनी तथा जीवनसाथी की स्वास्थ्य जाँच के लिए समय निकालें।
शनि के अष्टकवर्ग बिंदु। अष्टकवर्ग जन्म कुंडली से बनी अंकों (बिंदुओं) की तालिका है। फलदीपिका (26.41, 23.10) के अनुसार जिस राशि में आपकी कुंडली में शनि के बिंदु ज़्यादा हों, वहाँ गोचर हल्का रहता है: आठ में से पाँच या ज़्यादा शुभ, चार मिले-जुले, उससे कम भारी। अपनी कुंडली में शनि के बिंदु देखें।
ढैय्या के वे उपाय जो घरों में पीढ़ियों से किए जाते हैं। मुफ़्त, और हर एक की वजह के साथ।
शनि मंत्र · शनिवार को 108 बार
ॐ शं शनैश्चराय नमः
शनि का छोटा मंत्र, उनके बीज अक्षर “शं” पर बना। हर हफ़्ते बिना नागा इसका जाप करना अपने-आप में वही अनुशासन है जो शनि माँगते हैं।
नीलम ढैय्या का आम उपाय नहीं है। यह कुछ कुंडलियों के लिए शुभ है और कुछ के लिए हानिकारक, इसलिए अपनी कुंडली दिखाकर ही पहनें।
हर राशि के लिए शनिवार के उपायों के साथ, यह उपाय ख़ास तौर पर कर्क राशि के लिए है।
आपकी राशि के स्वामी चंद्र हैं, और शनि चंद्र को शत्रु मानते हैं, इसलिए मन को सँभालने वाला उपाय पहले आता है: सोमवार को चंद्र के देवता भगवान शिव की पूजा करें और 'ॐ सोमाय नमः' का 108 बार जप (माला पर मंत्र का दोहराव) करें, जो आपकी राशि के स्वामी चंद्र को बल देता है। शनिवार को दशरथकृत शनि स्तोत्र (राजा दशरथ की रची मानी जाने वाली शनि की स्तुति) का पाठ शनि की ओर से राहत देता है।
यह कैसी जाएगी, यह आपकी अपनी कुंडली तय करती है।
अपनी कुंडली के लिए पढ़ें

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आपका महीना दिन-ब-दिन, आपकी अपनी कुंडली से: अच्छे दिन, सँभलकर चलने वाले दिन, और ज़रूरी कामों की सही तारीख़ें।
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उदाहरण के लिए साइट की नमूना कुंडली लें: जन्म 15 जुलाई 1990, दोपहर 2:30 बजे, मुंबई। चंद्र मीन में हैं, इसलिए इस कुंडली की अगली ढैय्या कंटक शनि है, शनि मिथुन में, 31 मई 2032 से 13 जुलाई 2034 तक, यानी वही तारीख़ें जो हर मीन राशि वाले की हैं। फ़र्क़ इन चार बातों से आता है।
किसी दूसरे मीन राशि वाले की तारीख़ें यही होंगी, पर बाक़ी बातें शायद ही मिलें। कर्क राशि के दो लोगों के साथ भी यही है: इस पेज की तारीख़ें दोनों की एक हैं, पर वे क्या लाती हैं, यह एक-सा नहीं।
कर्क राशि की हर ढैय्या और साढ़े साती, क्रम से। कर्क राशि की अगली साढ़े साती 31 मई 2032 से 13 जुलाई 2039 तक है। तारीख़ें निरयन (लाहिड़ी अयनांश, भारत सरकार का मानक) हैं; दूसरी साइटों से अंतर की एक वजह यह भी है।
| ढैय्या | शनि किस राशि में | कब से | कब तक | अवधि | |
|---|---|---|---|---|---|
| कंटक शनि | तुला | 6 अक्टूबर 1982 | 17 सितंबर 1985 | 2 साल 11 महीने | बीता |
| अष्टम शनि | कुंभ | 5 मार्च 1993 | 16 फ़रवरी 1996 | 2 साल 11 महीने | बीता |
| कंटक शनि | तुला | 15 नवंबर 2011 | 2 नवंबर 2014 | 3 साल | बीता |
| अष्टम शनि | कुंभ | 29 अप्रैल 2022 | 29 मार्च 2025 | 2 साल 11 महीने | बीता |
| कंटक शनि | तुला | 28 जनवरी 2041 | 30 अगस्त 2044 | 3 साल 7 महीने (पहली बार शनि सिर्फ़ 9 दिन तुला में रहेंगे) | आगे |
| अष्टम शनि | कुंभ | 25 फ़रवरी 2052 | 5 फ़रवरी 2055 | 2 साल 11 महीने | आगे |
| कंटक शनि | तुला | 4 नवंबर 2070 | 23 अक्टूबर 2073 | 3 साल | आगे |
| अष्टम शनि | कुंभ | 12 अप्रैल 2081 | 20 मार्च 2084 | 2 साल 11 महीने | आगे |
एक समय में दो राशियों पर ढैय्या रहती है: जिसके चौथे भाव में शनि हैं, और जिसके आठवें में। जब शनि अगली राशि में कुछ महीने रहकर लौटते हैं, तो उतने समय ढैय्या अगली दो राशियों पर चली जाती है और फिर लौट आती है।
इस हिस्से में और: साढ़े साती · बारहों राशियों की ढैय्या · दोष क्या है
नहीं। शनि मीन में हैं, कर्क से नौवें भाव में; ढैय्या चौथे या आठवें भाव में शनि होने पर होती है। पिछली ढैय्या, अष्टम शनि, 29 मार्च 2025 को ख़त्म हुई।
कंटक शनि 28 जनवरी 2041 से 30 अगस्त 2044 तक; अष्टम शनि 25 फ़रवरी 2052 से 5 फ़रवरी 2055 तक।
कंटक शनि यानी चंद्र राशि से चौथे भाव में शनि का गोचर; इससे घर, माँ, ज़मीन-जायदाद और मन की शांति देखी जाती है। अष्टम शनि यानी आठवें भाव में शनि का गोचर; इससे सेहत, अचानक की घटनाएँ और ससुराल देखे जाते हैं। कर्क राशि की कंटक ढैय्या में शनि तुला में होते हैं, और अष्टम ढैय्या में कुंभ में।
कर्क राशि की दोनों ढैय्याएँ शनि की सबसे अच्छी राशियों में पड़ती हैं। कंटक शनि वाली ढैय्या तुला (शनि की उच्च राशि) में पड़ती है, जो हानि नहीं करती (फलदीपिका 26.31)। अष्टम शनि वाली ढैय्या कुंभ (शनि की अपनी राशि) में पड़ती है, जो हानि नहीं करती (फलदीपिका 26.31); पर आठवाँ भाव शनि की सबसे कड़ी चेतावनी वाले भावों में है (फलदीपिका 26.33), इसलिए इसे काफ़ी हल्का मानें, शून्य नहीं। आप पर कितना असर होगा, यह आपके लग्न, आपकी दशा और आपकी कुंडली में शनि के बिंदुओं पर निर्भर है।
इस पेज पर दिए मुफ़्त उपाय: शनिवार के उपाय जो हर राशि के लिए हैं (शनि मंत्र, हनुमान चालीसा, पीपल के नीचे दीया, मेहनतकशों और बुज़ुर्गों की सेवा), और वह उपाय जो ख़ास तौर पर कर्क राशि के लिए है, उसकी वजह के साथ। नीलम अपनी कुंडली दिखाकर ही पहनें।
ढैय्या क्या लाएगी, यह आपकी पूरी कुंडली से पढ़ा जाता है: आपका लग्न, आपकी दशा और शनि कहाँ बैठे हैं।
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