
जन्म कुंडली
Janam Kundliआपकी पूरी कुंडली का फल: हर ग्रह, हर भाव और हर योग, दशाएँ तारीख़ों के साथ, और आपके लिए उपाय।
46 पन्नेहिंदी · अंग्रेज़ी · हिंग्लिश
अभी ढैय्या नहीं चल रही · अगली 2032 में शुरू होगी
ढैय्या, जिसे छोटी पनौती भी कहते हैं, तब होती है जब शनि आपकी चंद्र राशि से चौथे (कंटक शनि) या आठवें (अष्टम शनि) भाव से गुज़रते हैं; ग्रह का किसी राशि से होकर गुज़रना गोचर कहलाता है। नाम ‘ढाई’ से बना है, क्योंकि हर एक लगभग ढाई साल चलती है; शनि वक्री होकर सीमा पार लौटें तो यह और लंबी खिंचती है। मीन राशि पर ढैय्या तब होती है जब शनि मिथुन या तुला में हों। शनि अभी मीन में हैं, आपकी चंद्र राशि में ही: यह मीन राशि के लिए साढ़े साती है (चंद्र राशि और उसके दोनों ओर की राशियों पर शनि, लगभग साढ़े सात साल), ढैय्या नहीं। 8 अगस्त 2029 से 4 अक्टूबर 2029 तक, जब शनि वृषभ में होंगे, साढ़े साती थमी रहेगी। यह 17 अप्रैल 2030 को ख़त्म होगी; उसके बाद कंटक शनि 31 मई 2032 से शुरू होगा। मीन राशि की दोनों ढैय्याएँ उन राशियों, मिथुन और तुला, में पड़ती हैं जहाँ शनि सहज रहते हैं, इसलिए ये शत्रु राशि वाली ढैय्या से हल्की रहती हैं।
5 साल 7 महीने बाद शुरू होगी · 31 मई 2032
कंटक यानी काँटा, अष्टम यानी आठवाँ। दोनों की तारीख़ें अलग हैं, और जब शनि कुछ महीनों के लिए राशि छोड़कर लौटते हैं, तो अवधि पहले प्रवेश से आख़िरी निकास तक गिनी जाती है।
कंटक शनि
शनि मिथुन में, आपकी चंद्र राशि से चौथे भाव में
अगली · 31 मई 2032 से 13 जुलाई 2034 तक
लगभग 2 साल 1 महीना। शनि 31 मई 2032 को मिथुन में आएँगे और 13 जुलाई 2034 को निकलेंगे, बीच में लौटेंगे नहीं। शास्त्रीय नियम (फलदीपिका 26.25) के अनुसार इसका सबसे भारी हिस्सा तब है जब शनि मिथुन के आख़िरी तिहाई हिस्से (20° से 30°) में हों: 30 जुलाई 2033 से 13 जुलाई 2034 तक।
पिछली बार: 23 जुलाई 2002 से 26 मई 2005 तक।
अष्टम शनि
शनि तुला में, आपकी चंद्र राशि से आठवें भाव में
उसके बाद · 28 जनवरी 2041 से 30 अगस्त 2044 तक
लगभग 3 साल 7 महीने। शनि 28 जनवरी 2041 को तुला में आएँगे और 30 अगस्त 2044 को तुला को आख़िरी बार छोड़ेंगे। बीच में वे 6 फ़रवरी 2041 से 25 सितंबर 2041 तक वापस कन्या में जाएँगे (तब ढैय्या थमी रहेगी) और 11 दिसंबर 2043 से 22 जून 2044 तक आगे वृश्चिक में जाएँगे (तब ढैय्या थमी रहेगी)। पहली बार शनि तुला में सिर्फ़ 9 दिन रहेंगे। शास्त्रीय नियम (फलदीपिका 26.25) के अनुसार इसका सबसे भारी हिस्सा तब है जब शनि तुला के आख़िरी तिहाई हिस्से (20° से 30°) में हों: 16 दिसंबर 2042 से 16 मई 2043 तक, 12 सितंबर 2043 से 11 दिसंबर 2043 तक और 23 जून 2044 से 30 अगस्त 2044 तक।
पिछली बार: 15 नवंबर 2011 से 2 नवंबर 2014 तक।
ढैय्या का असर चार बातों से तय होता है: आपकी चंद्र राशि से गिनकर शनि किन भावों के स्वामी हैं, किस भाव में बैठे हैं, किन तीन भावों पर उनकी दृष्टि (नज़र) पड़ती है, और उस राशि में वे कितने सहज हैं, उच्च (सबसे बली) से नीच (सबसे निर्बल) तक। नियम मंत्रेश्वर के ज्योतिष ग्रंथ फलदीपिका के हैं।
शनि मित्र राशि में: सहज
मीन राशि के लिए शनि ग्यारहवें भाव (आय, लाभ और मित्र) और बारहवें भाव (व्यय, दूर स्थान और नींद) के स्वामी हैं। इसलिए जब वे मिथुन में, यानी चौथे भाव में हों, तो आने वाला धन और जाने वाला धन, दोनों घर से होकर गुज़रते हैं। यह घर पर ख़र्च या स्थान बदलने के रूप में दिख सकता है। शनि का यह गोचर कंटक शनि की ढैय्या कहलाता है, और इसका संबंध घर, माता, वाहन, भूमि-भवन और मन की शांति से है। मिथुन शनि की मित्र राशि है और कुछ राहत देती है। पर फलदीपिका 26.22 चौथे भाव के शनि के लिए जीवनसाथी, संबंधियों और धन से जुड़ी हानि की चेतावनी फिर भी देती है।
मिथुन से शनि की दृष्टि सिंह, धनु और मीन पर भी पड़ती है, यानी छठे भाव (दबाव वाला काम, विरोधी, क़र्ज़ और बीमारी), दसवें भाव (काम-काज, पद और बड़ों से व्यवहार) और पहले भाव (अपनी सेहत, आत्मविश्वास और दूसरों की नज़र में आपकी छवि) पर।
क्या करें घर के ख़र्च का लिखित हिसाब रखें, और घर या वाहन गिरवी रखकर किसी मित्र को उधार देने से पहले दो बार सोचें।
शनि उच्च के: सबसे न्यायप्रिय
तुला शनि की उच्च राशि है, और मीन राशि से यही आठवाँ भाव है। इसलिए वहाँ शनि के आने पर अष्टम शनि की ढैय्या होती है, जिसका संबंध स्वास्थ्य, अचानक होने वाली घटनाओं, छिपी बातों, ससुराल और पैतृक संपत्ति से है। फलदीपिका (26.31) के अनुसार उच्च के शनि हानि नहीं करते, पर आठवाँ भाव शनि की सबसे कड़ी चेतावनी वाले भावों में है (फलदीपिका 26.33)। इसलिए आठवें भाव के शनि के लिए फलदीपिका 26.22 में दी गई संतान, मित्रों और धन से जुड़ी हानि तथा रोग की चेतावनी को मीन राशि वाले बहुत हल्का समझें, पर बेअसर नहीं। ग्यारहवें भाव (आय, लाभ और मित्र) और बारहवें भाव (व्यय, दूर स्थान और नींद) के स्वामी होने से शनि लाभ, ख़र्च और मित्रों की बातें आठवें भाव में ले आते हैं।
तुला से शनि की दृष्टि धनु, मेष और कर्क पर भी पड़ती है, यानी दसवें भाव (काम-काज, पद और बड़ों से व्यवहार), दूसरे भाव (परिवार, जमा-पूँजी और बोलचाल) और पाँचवें भाव (संतान, पढ़ाई और समझ-बूझ) पर।
फलदीपिका 26.22 एक ही श्लोक है जो चंद्र से पहले आठ भावों में से हर एक के शनि का फल बताता है, इसीलिए दोनों ढैय्या में उसी का हवाला है।
क्या करें मित्रों के साथ पैसों का लेन-देन लिखकर रखें, नींद अच्छी रखें, और साल में एक बार स्वास्थ्य की जाँच कराते रहें।
शनि के अष्टकवर्ग बिंदु। अष्टकवर्ग जन्म कुंडली से बनी अंकों (बिंदुओं) की तालिका है। फलदीपिका (26.41, 23.10) के अनुसार जिस राशि में आपकी कुंडली में शनि के बिंदु ज़्यादा हों, वहाँ गोचर हल्का रहता है: आठ में से पाँच या ज़्यादा शुभ, चार मिले-जुले, उससे कम भारी। अपनी कुंडली में शनि के बिंदु देखें।
ढैय्या के वे उपाय जो घरों में पीढ़ियों से किए जाते हैं। मुफ़्त, और हर एक की वजह के साथ।
शनि मंत्र · शनिवार को 108 बार
ॐ शं शनैश्चराय नमः
शनि का छोटा मंत्र, उनके बीज अक्षर “शं” पर बना। हर हफ़्ते बिना नागा इसका जाप करना अपने-आप में वही अनुशासन है जो शनि माँगते हैं।
नीलम ढैय्या का आम उपाय नहीं है। यह कुछ कुंडलियों के लिए शुभ है और कुछ के लिए हानिकारक, इसलिए अपनी कुंडली दिखाकर ही पहनें।
हर राशि के लिए शनिवार के उपायों के साथ, यह उपाय ख़ास तौर पर मीन राशि के लिए है।
आपकी राशि के स्वामी गुरु हैं और वे शनि के प्रति सम हैं, इसलिए गुरु को बल देना ढैय्या में आपका विवेक स्थिर रखता है: गुरुवार को, जो परंपरा में गुरु का दिन है, बृहस्पति कवच (गुरु की रक्षा-स्तुति) का पाठ करें, या 'ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः' का 108 बार जप (माला पर मंत्र का दोहराव) करें। उसी दिन किसी शिक्षक को या मंदिर में चने की दाल और हल्दी का दान (श्रद्धा से दी गई भेंट) करें; परंपरा में गुरु के लिए यही दान बताया गया है।
यह कैसी जाएगी, यह आपकी अपनी कुंडली तय करती है।
अपनी कुंडली के लिए पढ़ें

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आपका महीना दिन-ब-दिन, आपकी अपनी कुंडली से: अच्छे दिन, सँभलकर चलने वाले दिन, और ज़रूरी कामों की सही तारीख़ें।
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उदाहरण के लिए साइट की नमूना कुंडली लें: जन्म 15 जुलाई 1990, दोपहर 2:30 बजे, मुंबई। चंद्र मीन में हैं, इसलिए इस कुंडली की अगली ढैय्या कंटक शनि है, शनि मिथुन में, 31 मई 2032 से 13 जुलाई 2034 तक, यानी वही तारीख़ें जो हर मीन राशि वाले की हैं। फ़र्क़ इन चार बातों से आता है।
किसी दूसरे मीन राशि वाले की तारीख़ें यही होंगी, पर बाक़ी बातें शायद ही मिलें। मीन राशि के दो लोगों के साथ भी यही है: इस पेज की तारीख़ें दोनों की एक हैं, पर वे क्या लाती हैं, यह एक-सा नहीं।
मीन राशि की हर ढैय्या और साढ़े साती, क्रम से। मीन राशि पर अभी साढ़े साती चल रही है, 17 अप्रैल 2030 तक। तारीख़ें निरयन (लाहिड़ी अयनांश, भारत सरकार का मानक) हैं; दूसरी साइटों से अंतर की एक वजह यह भी है।
| ढैय्या | शनि किस राशि में | कब से | कब तक | अवधि | |
|---|---|---|---|---|---|
| अष्टम शनि | तुला | 6 अक्टूबर 1982 | 17 सितंबर 1985 | 2 साल 11 महीने | बीता |
| कंटक शनि | मिथुन | 23 जुलाई 2002 | 26 मई 2005 | 2 साल 10 महीने | बीता |
| अष्टम शनि | तुला | 15 नवंबर 2011 | 2 नवंबर 2014 | 3 साल | बीता |
| कंटक शनि | मिथुन | 31 मई 2032 | 13 जुलाई 2034 | 2 साल 1 महीना | आगे |
| अष्टम शनि | तुला | 28 जनवरी 2041 | 30 अगस्त 2044 | 3 साल 7 महीने (पहली बार शनि सिर्फ़ 9 दिन तुला में रहेंगे) | आगे |
| कंटक शनि | मिथुन | 11 जुलाई 2061 | 9 मई 2064 | 2 साल 10 महीने | आगे |
| अष्टम शनि | तुला | 4 नवंबर 2070 | 23 अक्टूबर 2073 | 3 साल | आगे |
एक समय में दो राशियों पर ढैय्या रहती है: जिसके चौथे भाव में शनि हैं, और जिसके आठवें में। जब शनि अगली राशि में कुछ महीने रहकर लौटते हैं, तो उतने समय ढैय्या अगली दो राशियों पर चली जाती है और फिर लौट आती है।
इस हिस्से में और: साढ़े साती · बारहों राशियों की ढैय्या · दोष क्या है
ढैय्या नहीं, साढ़े साती चल रही है, जो 17 अप्रैल 2030 तक रहेगी। शनि अभी मीन में हैं, आपकी चंद्र राशि में ही।
कंटक शनि 31 मई 2032 से 13 जुलाई 2034 तक; अष्टम शनि 28 जनवरी 2041 से 30 अगस्त 2044 तक।
कंटक शनि यानी चंद्र राशि से चौथे भाव में शनि का गोचर; इससे घर, माँ, ज़मीन-जायदाद और मन की शांति देखी जाती है। अष्टम शनि यानी आठवें भाव में शनि का गोचर; इससे सेहत, अचानक की घटनाएँ और ससुराल देखे जाते हैं। मीन राशि की कंटक ढैय्या में शनि मिथुन में होते हैं, और अष्टम ढैय्या में तुला में।
दोनों का अपना भार है, अलग-अलग कारणों से। कंटक शनि वाली ढैय्या मिथुन (शनि के मित्र की राशि) में पड़ती है, जो इसे शत्रु राशि से हल्का रखती है। अष्टम शनि वाली ढैय्या तुला (शनि की उच्च राशि) में पड़ती है, जो हानि नहीं करती (फलदीपिका 26.31); पर आठवाँ भाव शनि की सबसे कड़ी चेतावनी वाले भावों में है (फलदीपिका 26.33), इसलिए इसे काफ़ी हल्का मानें, शून्य नहीं। आप पर कितना असर होगा, यह आपके लग्न, आपकी दशा और आपकी कुंडली में शनि के बिंदुओं पर निर्भर है।
इस पेज पर दिए मुफ़्त उपाय: शनिवार के उपाय जो हर राशि के लिए हैं (शनि मंत्र, हनुमान चालीसा, पीपल के नीचे दीया, मेहनतकशों और बुज़ुर्गों की सेवा), और वह उपाय जो ख़ास तौर पर मीन राशि के लिए है, उसकी वजह के साथ। नीलम अपनी कुंडली दिखाकर ही पहनें।
ढैय्या क्या लाएगी, यह आपकी पूरी कुंडली से पढ़ा जाता है: आपका लग्न, आपकी दशा और शनि कहाँ बैठे हैं।
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